आखिरकार श्रीलंका के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से अच्छी खबर आई। आईएमएफ के कार्यकारी बोर्ड ने श्रीलंका के लिए तीन बिलियन डॉलर का ऋण जारी करने का फैसला किया है। इससे यहां आर्थिक संकट के संभलने उम्मीद बंधी है।
जानकारों के मुताबिक सबसे पहला असर श्रीलंकाई मुद्रा रुपये की कीमत में सुधार के रूप में सामने आ सकता है। पिछले साल आर्थिक संकट शुरू होने के पहले एक अमेरिकी डॉलर 200 श्रीलंकाई रुपये के बराबर था। इस समय एक डॉलर की कीमत 360 रुपये है। रुपये की कीमत में गिरावट का एक बड़ा कारण श्रीलंका के सेंट्रल बैंक की मुद्रा की अंधाधुंध छपाई कर देश में उपलब्ध कराने की नीति थी। उससे कई तरह की समस्याएं पैदा हुईं।
आईएमएफ ने अपने एक बयान में कहा है- ‘श्रीलंका कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसकी वजह कुछ पुरानी कमजोरियां और नीति संबंधी गलत फैसले हैं, जिनकी वजह से संकट खड़ा हुआ। कुछ बाहरी घटनाओं से स्थिति और बिगड़ गई।’ आईएमएफ ने कहा है कि नया ऋण देने के उसके कार्यक्रम का मकसद श्रीलंका की सकल अर्थव्यवस्था में स्थिरता बहाल करना और उसके दिए गए कर्ज को सुरक्षित बनाना है। साथ ही इस प्रोग्राम का उद्देश्य गरीब और कमजोर तबकों आर्थिक संकट के प्रभावों से राहत देना, वित्तीय क्षेत्र में स्थिरता की रक्षा करना, शासन व्यवस्था को मजबूत बनाना और आर्थिक विकास की संभावनाओं को मजबूत करना है।
आईएमएफ ने कुछ समय पहले यह संकेत दिया था कि उसकी शर्तों के मुताबिक श्रीलंका सरकार ने जो आर्थिक कदम उठाए हैं, उससे वह संतुष्ट है। उसके बाद श्रीलंका ने अपने दूसरे कर्जदाताओं से ऋण चुकाने की समय-सारणी में बदलाव संबंधी आश्वासन पत्र हासिल करने की शर्त भी पूरी कर दी। इससे आईएमएफ से ऋण मिलने की संभावना मजबूत हुई थी। इसे देखते हुए पिछले कम से कम दो हफ्तों से विनिमय बाजार में श्रीलंकाई रुपये की कीमत बढ़नी शुरू हो गई।
आईएमएफ का ऋण प्रोग्राम चार साल में पूरा होगा। इस अवधि में तीन बिलियन डॉलर की रकम श्रीलंका सरकार को मिलेगी। आशा है कि आईएमएफ का कर्ज मिलना शुरू होने के बाद दूसरी कर्जदाता एजेंसियां भी श्रीलंका को ऋण देने के लिए तैयार हो जाएंगी। ऐसी खबरें रही हैं कि विश्व बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाएं आईएमएफ के निर्णय का इंतजार कर रही थीं।
श्रीलंका के आर्थिक संकट की शुरुआत कोरोना महामारी आने के साथ हुई। लॉकडाउन के दिनों में पर्यटन उद्योग ठप हो गया, जो श्रीलंका के लिए विदेशी मुद्रा का प्रमुख स्रोत है। इस दौरान तत्कालीन गोटबया राजपक्षे सरकार ने भी कुछ ऐसे फैसले किए, जिनकी आगे चल कर भारी कीमत देश को चुकानी पड़ी। उनमें एक अचानक लिया गया वह फैसला भी था, जिसके तहत देश में रासायनिक खादों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई।
आर्थिक संकट बढ़ने के साथ देश में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था। पिछले साल मार्च से शुरू हुआ विरोध ने जुलाई में एक बड़े जन विद्रोह की शक्ल ले लिया। तब राष्ट्रपति राजपक्षे को पद छोड़ कर देश से भागना पड़ा था। तब से रानिल विक्रमसिंघे राष्ट्रपति हैं, जिनकी सरकार आईएमएफ से कर्ज पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए थी।