कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से भारत को सबसे ज्यादा खतरा क्यों है?
भारत अपनी जरूरत का 89% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। युद्ध शुरू होने के बाद से ब्रेंट क्रूड 50% से अधिक उछलकर 117 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता 'होर्मुज जलडमरूमध्य' है, जहां से हमारा रोजाना 26 लाख बैरल तेल गुजरता है। कतर के ऊर्जा मंत्री ने चेतावनी दी है कि अगर खाड़ी देशों के ऊर्जा निर्यात पर असर पड़ा, तो तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।
सोने-चांदी में उतार-चढ़ाव और रुपये के टूटने के क्या मायने हैं?
सोमवार को दिल्ली में चांदी की कीमतों में 3,400 रुपये की गिरावट आई और यह 2.68 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई, जबकि सोने का भाव लगभग स्थिर रहा और 1,64,300 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बना रहा। अस्थिर वैश्विक बाजारों के बीच मजबूत अमेरिकी डॉलर ने कीमती धातुओं की मांग को कम कर दिया।
ऑल इंडिया सर्राफा एसोसिएशन के अनुसार, सफेद धातु (सोने) में लगातार तीसरे दिन गिरावट जारी रही और शुक्रवार के बंद भाव 2,71,700 रुपये प्रति किलोग्राम से गिरकर 3,400 रुपये या लगभग 1.3 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2,68,300 रुपये प्रति किलोग्राम (सभी करों सहित) पर पहुंच गया। एचडीएफसी सिक्योरिटीज के कमोडिटीज के वरिष्ठ विश्लेषक सौमिल गांधी ने कहा, "कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि से मुद्रास्फीति का दबाव फिर से बढ़ने की आशंका बढ़ गई है, जिसके चलते चांदी की कीमतों में पिछले सप्ताह की गिरावट जारी रही।"
ऊर्जा की बढ़ती कीमतें व्यापक मुद्रास्फीति की आशंकाओं को बढ़ावा देती हैं, जिससे फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की गति में देरी हो सकती है। उन्होंने आगे कहा कि इस परिदृश्य से अमेरिकी डॉलर और ट्रेजरी यील्ड को समर्थन मिला, जिससे बदले में कीमती धातुओं पर दबाव पड़ा।
तेल महंगा होने से भारतीय आयातकों की ओर से डॉलर की भारी मांग पैदा हुई है। रिजर्व बैंक के दखल के बावजूद भारी दबाव के चलते रुपया 92.33 प्रति डॉलर के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर लुढ़क गया। रुपये की इस कमजोरी से न सिर्फ हमारा आयात बिल बढ़ेगा, बल्कि चालू खाता घाटा भी बढ़ेगा।
क्या इस संकट से कॉरपोरेट कंपनियों और महंगाई पर सीधा असर पड़ेगा?
जी हां। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से लॉजिस्टिक्स, ट्रांसपोर्टेशन, विमानन और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स की लागत बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर महंगाई पर होगा, क्योंकि माल ढुलाई महंगी होने से आम जरूरत की चीजें महंगी हो जाएंगी। हालांकि वित्त मंत्री ने सोमवार को लोकसभा में देश को भरोसा दिया है कि क्रूड ऑयल की कीमतें भरते से तत्कालिक रूप से देश में महंगाई बढ़ने की आशंका नहीं है। दूसरी ओर, विश्लेषक निफ्टी की कंपनियों की आय में 12% वृद्धि की उम्मीद कर रहे थे, उनका मानना है कि अब कंपनियों के मार्जिन सिकुड़ेंगे और अर्निंग रिकवरी शिथिल पड़ सकती है।
क्या भारतीय अर्थव्यवस्था इस भारी झटके को सहने के लिए तैयार है?
राहत की बात यह है कि भारत इस बार पिछले संकटों की तुलना में काफी मजबूत स्थिति में है। सरकार के पास कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का 25 करोड़ (250 मिलियन) बैरल का बफर रिजर्व मौजूद है, जो सात से आठ हफ्ते की जरूरत पूरी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, भारत ने अब 27 के मुकाबले करीब 40 देशों से तेल मंगाना शुरू कर दिया है। खाड़ी देशों के अलावा रूस, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और मध्य एशियाई देशों से भी आपूर्ति हासिल हो रही है। हमारा 60% तेल अब वैकल्पिक रास्तों से आ रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार और मजबूत आर्थिक बुनियादी ढांचे (वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में चालू खाता घाटा मात्र 0.8%) से भी अर्थव्यवस्था को एक सुरक्षा कवच मिला हुआ है।
अब आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल भारत के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और विविध ऊर्जा स्रोतों ने अर्थव्यवस्था को एक ढाल प्रदान की है। लेकिन, अगर मध्य-पूर्व का यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो महंगाई, कॉरपोरेट आय और रुपये के मोर्चे पर भारतीय अर्थव्यवस्था की कड़ी परीक्षा होगी।