पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक संकट ने मंगलवार को ग्लोबल वित्तीय बाजारों में हड़कंप मचा दिया है। इजरायल द्वारा लेबनान पर हमले और उसके जवाब में ईरान द्वारा खाड़ी देशों के ऊर्जा बुनियादी ढांचे तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में टैंकरों पर किए गए हमलों के बाद निवेशकों में भारी घबराहट है। इसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखा है।
आमतौर पर संकट के समय निवेशक इक्विटी (शेयर) बेचकर सुरक्षित निवेश (जैसे सोना और बॉन्ड) की तरफ भागते हैं। लेकिन इस बार बाजार का बर्ताव बिल्कुल अलग है। शेयर, बॉन्ड और सुरक्षित माना जाने वाला सोना, तीनों एक साथ गिर रहे हैं।
इस वैश्विक तनाव के बीच निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से पैसा निकालकर नगदी जमा कर रहे हैं। LSEG लिपर डेटा के अनुसार, ग्लोबल मनी मार्केट फंड्स (शॉर्ट-टर्म कैश इंस्ट्रूमेंट्स) में 47.9 बिलियन डॉलर का भारी निवेश हुआ है, जो 17 फरवरी के बाद सबसे अधिक है। दूसरी ओर, निवेशकों ने ग्लोबल इक्विटी फंड्स से 9.1 बिलियन डॉलर निकाल लिए हैं। जेपी मॉर्गन एसेट मैनेजमेंट के डेविड केली का कहना है कि यह क्वालिटी की ओर उड़ान का दिलचस्प रूप है, जहां मांग सीधे शॉर्ट-टर्म कैश के लिए बढ़ रही है।
जानकारों का मानना है कि वर्तमान में बाजार पूरी तरह से 'शॉक' की स्थिति में है। महंगाई बढ़ाने वाले तेल के दामों में उछाल और युद्ध की अनिश्चितता ने निवेशकों को डरा दिया है। हालांकि, जेपी मॉर्गन के केली चेतावनी देते हैं कि डॉलर की यह तेजी लंबे समय तक नहीं टिक सकती। उनका मानना है कि "युद्ध झटके और खौफ से शुरू होते हैं, लेकिन दलदल में खत्म होते हैं, जो डॉलर के लिए नकारात्मक साबित हो सकता है"। जब तक मध्य पूर्व में तनाव के बादल नहीं छंटते, शेयर बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव जारी रहने की पूरी आशंका है।