रुपये में मौजूदा कमजोरी के बावजूद अगले वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में मजबूती से वापसी करने की संभावना हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि रुपया फिलहाल अवमूल्यन के दौर से गुजर रहा है, लेकिन भविष्य में इसमें सुधार देखा जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रुपये की चाल पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) का बड़ा असर हुआ करता था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 से पहले तक मजबूत पोर्टफोलियो इनफ्लो ही रुपये की दिशा तय करने का प्रमुख कारण थे।
हालांकि अब वैसी बड़ी पूंजी आमदनी उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं, खासतौर पर व्यापार समझौतों में देरी, रुपये को प्रभावित करने वाले सबसे अहम कारक बन गई हैं। इसमें कहा गया कि आसान और बड़े पूंजी प्रवाह का दौर खत्म हो चुका है और वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता हावी है।
इन चुनौतियों के बावजूद, रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के व्यापार आंकड़े मजबूत लचीलापन दर्शाते हैं। इसमें यह भी बताया गया है कि देश लंबे समय से चली आ रही वैश्विक अनिश्चितता, बढ़ते संरक्षणवाद और श्रम आपूर्ति में आए झटकों को बिना किसी बड़ी बाधा के संभालने में सक्षम रहा है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि समय के साथ रुपये की गति को तीन अलग-अलग चरणों में विभाजित किया जा सकता है। पहले चरण में, जनवरी 2008 से मई 2014 तक, डॉलर की मजबूती की तुलना में रुपये का मूल्य काफी अधिक गिर गया। इस अवधि के दौरान, डॉलर में औसतन 1.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि रुपये में औसतन 16.3 प्रतिशत की गिरावट आई, जो कमजोर घरेलू आर्थिक परिस्थितियों को दर्शाती है।
दूसरे चरण में, मई 2014 से मार्च 2021 तक, रुपये के मूल्य में गिरावट मोटे तौर पर डॉलर की मजबूती के अनुरूप रही। रुपये में औसतन 7.9 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि डॉलर में 5.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो दोनों मुद्राओं के बीच अधिक समन्वित गति को दर्शाता है।
तीसरे चरण में, सितंबर 2024 से अब तक, रुपया और डॉलर दोनों एक साथ अवमूल्यन कर रहे हैं। एसबीआई ने कहा कि यह एक साथ गिरावट वर्तमान वैश्विक परिवेश में बढ़ी हुई भू-राजनीतिक अनिश्चितता से प्रेरित एक नए चरण का संकेत है।