रिजर्व बैंक ने आज रेपो दरों में 50 बेसिस प्वाइंट की कटौती कर दी। इसके बाद रेपो रेट 5.5 प्रतिशत हो गया है। लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व रेपो रेट 6.50 प्रतिशत था। उसके हिसाब से देखें तो रेपो दरों में सीधे एक प्रतिशत तक की भारी कटौती हुई है। रेपो दरों के कम होने से आम आदमी को यह उम्मीद होती है कि उसके होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की ईएमआई में कटौती हो जाएगी। यह आवश्यक नहीं है कि रेपो दरों में कमी के कारण आपकी ईएमआई भी कम हो जाए।
दरअसल, कोरोना काल के बाद महंगाई को कंट्रोल करने के लिए रिजर्व बैंक ने रेपो दरों में बढ़ोतरी करना शुरू किया था। यह रिकॉर्ड 6.50 प्रतिशत तक हो गई थी। रेपो रेट (बैंकों को रिजर्व बैंक से मिलने वाले कर्ज पर ब्याज की दर) में बढ़ोतरी होने के बाद सभी बैंकों ने उपभोक्ताओं की ईएमआई में बढ़ोतरी कर दी। इस बढ़ोतरी के कारण लोगों की ईएमआई में उनके कर्ज के अनुसार दो-तीन हजार रूपये से लेकर 10-12 हजार रुपये तक की बढ़ोतरी हो गई थी। इससे आम उपभोक्ताओं की कमर टूटने लगी थी।
महंगाई के नियंत्रण में आने के बाद रिजर्व बैंक ने रेपो दरों में कटौती करना शुरू कर दिया। सबसे पहले इसी साल की फरवरी में 25 आधार अंकों की कमी की गई थी और इसके तुरंत बाद पिछले अप्रैल महीने में भी मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (एमपीसी) की बैठक के बाद रेपो दरों में 25 आधार अंकों की कटौती कर दी गई।
इसका यह असर हुआ कि प्रमुख बैंकों ने रेपो दरों में कमी का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाया। सबसे पहले देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी ब्याज दरों में कमी की घोषणा की थी। उसके बाद एसबीआई का अनुसरण करते हुए बैंक ऑफ महाराष्ट्र, इंडियन बैंक और पंजाब नेशनल बैंक ने ब्याज दरों में कमी कर आम उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाया।
कई बैंकों ने रेपो दरों में कमी के बाद भी अब तक आम उपभोक्ताओं की ईएमआई में कटौती नहीं की है। आर्थिक मामलों के जानकारों के अनुसार, इसमें सबसे ज्यादा प्राइवेट सेक्टर के बैंक हैं जिन्होंने रेपो दरों में बढ़ोतरी के बाद ईएमआई में तुरंत बढ़ोतरी कर दी, लेकिन पिछले दो रेपो दरों में कमी के बाद भी ईएमआई कम नहीं की और इसका लाभ आम उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचाया।
क्या है नियम?
दरअसल, आर्थिक मामलों के जानकारों के अनुसार, रेपो दरों में कटौती के बाद भी बैंक ब्याज दरों में कमी करने के लिए बाध्य नहीं हैं। लेकिन बाजार में कर्ज बांटने के व्यापार में आपसी कंपटीशन को देखते हुए बैंक एक दूसरे को देखते हुए ब्याज दरों में कमी करते हैं। लेकिन सीधे तौर पर ऐसा कोई कानून नहीं है जिसके कारण वे ऐसा करने के लिए मजबूर किये जा सकें। फिक्स दरों पर लोन लेने वाले उपभोक्ताओं पर रेपो दरों में कटौती या बढ़ोतरी का कोई लाभ-नुकसान नहीं होता।
हालांकि, रिजर्व बैंक ने कुछ अवसरों पर बैंकों को यह सलाह दी थी कि रेपो दरों में कमी का लाभ बैंकों को आम उपभोक्ताओं तक पहुंचाना चाहिए। इसके बाद बैंक रेपो दरों में कमी का लाभ आम उपभोक्ताओं को पहुंचाने लगे हैं। फिलहाल, वर्तमान कटौती का लाभ उपभोक्ताओं को किस प्रकार दिया जाता है, इस पर सबकी नजर बनी रहेगी।