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RBI: महंगे कर्ज से दिसंबर में राहत संभव, जीडीपी वृद्धि दर में गिरावट से आरबीआई पर बढ़ा दबाव

सार

टेरेसा जॉन ने कहा, उम्मीद से अधिक मंदी मौद्रिक नीति की कहानी को बदल सकती है। दिसंबर में दर में कटौती की अब ज्यादा संभावना है। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता ने कहा, दिसंबर से दर कटौती चक्र शुरू हो सकता है।
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आरबीआई (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
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विस्तार
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जीडीपी वृद्धि दर में दूसरी तिमाही में भारी गिरावट से आरबीआई पर दरों को कम करने का दबाव बढ़ गया है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि महंगाई को काबू में करने के बजाय अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने पर जोर होना चाहिए। ऐसे में आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति दिसंबर में दरों में कटौती का फैसला कर सकती है। बैठक का फैसला 6 दिसबंर को  घोषित होगा।
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अर्थशास्त्री टेरेसा का तर्क
निर्मल बंग इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की अर्थशास्त्री टेरेसा जॉन ने कहा, उम्मीद से अधिक मंदी मौद्रिक नीति की कहानी को बदल सकती है। दिसंबर में दर में कटौती की अब ज्यादा संभावना है। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता ने कहा, दिसंबर से दर कटौती चक्र शुरू हो सकता है। दर में कितनी कमी होगी यह तय नहीं है, लेकिन नीति निर्माताओं को बैंकों के नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) को कम करना पड़ सकता है। या बैंकों की कर्ज देने की क्षमता बढ़ाने में मदद के लिए कुछ अन्य प्रकार के तरलता उपायों को सक्रिय किया जा सकता है। सीआरआर वह दर है जिस पर बैंक आरबीआई के पास कुल जमा का कुछ हिस्सा रखते हैं। कोटक अल्टरनेट एसेट की लक्ष्मी अय्यर कहती हैं अब दरों को घटाने का अवसर है। हालांकि, संभावना इसलिए कम है, क्योंकि खाने-पीने की चीजों के दाम अब भी ऊंचे स्तर पर हैं।

डॉलर की मजबूती का भी है असर
यूटीआई के इक्विटी के फंड मैनेजर अजय त्यागी ने कहा कि डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है। रुपये पर इसका दबाव कम करने के लिए आरबीआई अमेरिकी केंद्रीय बैंक की दिसंबर में होने वाली नीतिगत दरों की बैठक के बाद ही कोई फैसला कर सकता है। एक अग्रणी बैंक के शीर्ष अधिकारी के मुताबिक, दरें बहुत ज्यादा हैं। इसका सीधा असर कर्ज वृद्धि पर भी दिख रहा है। ऐसे में आरबीआई को दरों को कम करना चाहिए।
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वहीं विश्लेषकों के मुताबिक, महंगाई को काबू करने के चक्कर में विकास की बलि देना ठीक नहीं है। अक्तूबर में खुदरा महंगाई के 6.21 फीसदी की दर को छोड़ दें तो ज्यादातर समय में महंगाई आरबीआई के ऊपरी दायरे 6 फीसदी से कम ही रही है। फिर भी आरबीआई ने दरों को यथावत रखा है।

वित्त मंत्री व गोयल ने भी दी दर कम करने की सलाह
कर्ज की ऊंची ब्याज दर से सरकारी महकमा पहले से ही परेशान है। नवंबर में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने दो कार्यक्रमों में बैंकों को ऊंची दर को कम करने की सलाह दे डाली। सीतारमण ने तो एसबीआई के कार्यक्रम में ही कहा, कर्ज पर ब्याज दरें ऊंची हैं। इसे कम किया जाए। गोयल ने कहा, महंगाई की ऊंची दरों को कर्ज की दर से जोड़ने का कोई तर्क नहीं है। यह गलत सिद्धांत है। इन सब कारणों और मंत्रियों की चेतावनी के बाद यह उम्मीद है कि दरों को इस बार तो कम किया ही जा सकता है।

बता दें कि सरकारी महकमों के साथ बैंकिंग अधिकारी भी इस पर एकमत हैं। आरबीआई भी इस समय सकते में है क्योंकि उसकी उम्मीद जीडीपी वृद्धि दर की सात फीसदी की थी। लेकिन जो आंकड़ा 5.4 फीसदी का आया, वह उसकी तुलना में दो फीसदी से ज्यादा कम है।

निजी उपभोग के खर्च में भारी गिरावट
निजी उपभोग पर खर्च पहली तिमाही के 7.4% से कम होकर दूसरी तिमाही में 6% पर आ गया। खासकर शहरी क्षेत्रों में, जहां परिवारों को उधार लेने की बढ़ती लागत और उच्च महंगाई के कारण दबाव झेलना पड़ा है। खाद्य पदार्थों की बढ़ी कीमतों ने विशेष रूप से ग्रामीण और  शहरी दोनों क्षेत्रों में निम्न आय वाले समूहों को नुकसान पहुंचाया है।
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