आरबीआई इस महीने की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में नीतिगत रेपो दर को 5.5% पर अपरिवर्तित रखेगा। यस बैंक की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, दरों में कटौती की गुंजाइश बेहद सीमित है, जिससे नीति निर्णय 'टच-एंड-गो' स्थिति में बना हुआ है। इसमें कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि आरबीआई दिसंबर में रुकावट बनाए रखेगा और न तो दरों में बदलाव करेगा और न ही अपने रुख में परिवर्तन करेगा।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि खुदरा महंगाई लगातार 2 प्रतिशत से नीचे बनी हुई है और अगले 3 से 4 महीनों तक निम्न स्तर पर रहने की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर, भारत की आर्थिक वृद्धि अपेक्षाओं से बेहतर प्रदर्शन कर रही है, जिससे नीति पर तत्काल नरमी की संभावना घटती है।
वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही और अक्तूबर के उच्च आवृत्ति आंकड़ों ने भी स्थिर विस्तार का संकेत दिया। हालांकि, हाल ही में जारी कुछ संकेतक, जैसे कि विनिर्माण पीएमआई और आईआईपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, निचले स्तर पर दर्ज किए गए। यह गति में संभावित नरमी को दर्शाते हैं।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि त्योहारी मांग कम होने और केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में कमी आने के कारण आने वाली तिमाहियों में विकास को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, आधार प्रभावों के कारण खुदरा मुद्रास्फीति में थोड़ी वृद्धि होने की उम्मीद है। इस पृष्ठभूमि में, रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई को इस बार कटौती नहीं करनी चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि आरबीआई अपने मुद्रास्फीति पूर्वानुमानों को कम कर सकता है। केंद्रीय बैंक वित्त वर्ष 26 के लिए अपने मुद्रास्फीति पूर्वानुमान को घटाकर 1.8-2.0 प्रतिशत कर सकता है, जबकि वर्तमान अनुमान 2.6 प्रतिशत है।
इसमें कहा गया है कि वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के लिए मुद्रास्फीति अनुमान को भी आरबीआई के मौजूदा अनुमान 4.5 प्रतिशत से घटाकर लगभग 4 प्रतिशत किया जा सकता है, जबकि यस बैंक का अनुमान है कि मुद्रास्फीति 3.1 प्रतिशत रहेगी।
रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई के सामने कठिन नीतिगत विकल्प है, विकास दर मजबूत बनी हुई है, जबकि मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत से नीचे रहने के कारण ब्याज दरों में कटौती उचित हो सकती है।