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RBI का सख्त कदम: ब्रोकर फंडिंग पर 100 फीसदी कोलैटरल अनिवार्य, जानें इससे क्या-क्या होगा बदलाव

Sat, 28 Feb 2026 06:13 PM IST
Riya Dubey बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

आरबीआई ने ब्रोकर फंडिंग पर सख्ती करते हुए बैंकों के लिए 100% कोलैटरल अनिवार्य कर दिया है और प्रोप ट्रेडिंग के लिए सीधे फंडिंग पर रोक लगाई है। इसका उद्देश्य बढ़ते लीवरेज, जोखिमपूर्ण ट्रेडिंग और डिफॉल्ट के खतरे को कम करना व वित्तीय प्रणाली को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाना है।
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शेयर बाजार का हाल - फोटो : Adobestock
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विस्तार
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बैंकिग और कैपिटल मार्केट से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ब्रोकर फंडिंग को लेकर सख्त रुख अपनाया है। नए निर्देशों के तहत बैंकों को शेयर ब्रोकरों या ब्रोकिंग संस्थाओं की दी जाने वाली फंडिंग के बदले 100 प्रतिशत कोलैटरल लेना अनिवार्य किया है। यानी अब जितनी राशि का फंडिंग एक्सपोजर होगा, उतना ही पूरी वैल्यू का सुरक्षा गिरवी (कोलैटरल) रखना जरूरी होगा। यह कदम बाजार में बढ़ते लीवरेज, ब्रोकिंग जोखिमपूर्ण ट्रेडिंग और संभावित डिफॉल्ट की आशंका को कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है। हाल के वर्षों में डेरिवेटिव्स और मार्जिन ट्रेडिंग में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जिससे वित्तीय स्थितरता पर दबाव की चिंता बढ़ी थी।

ब्रोकिंग कंपनियों से आप क्या समझते हैं?

ब्रोकिंग कंपनियां वे वित्तीय संस्थान होती हैं जो शेयर बाजार में निवेशकों के लिए खरीदी और बिक्री की प्रक्रिया को आसान बनाते हुए बीच के माध्यम की भूमिका निभाती हैं। ये कंपनियां सेबी या संबंधित नियामक संस्थाओं के तहत पंजीकृत होती हैं और निवेशकों को शेयर, बॉन्ड, डेरिवेटिव और कमोडिटी में ट्रेडिंग की सुविधा देने के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती हैं। इसके बदले वे ब्रोकरेज या कमीशन शुल्क वसूलती हैं।

कोलैटरल क्या होता है?

कोलैटरल वह संपत्ति या सुरक्षा होती है, जिसे कोई व्यक्ति या संस्था लोन या फंडिंग के बदले गिरवी रखती है। जब आप बैंक से पैसा लेते हैं, तो बैंक अपने जोखिम को कम करने के लिए बदले में कोई गारंटी मांगता है यही कोलैटरल कहलाता है।

यह फैसला क्यों लिया गया है?

  • आरबीआई का मानना है कि पार्याप्त कोलैटरल से बैंकों का जोखिम कम हो गया और सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ेगी।
  • इसे लेकर आरबीआई ने 13 फरवरी को वाणिज्यिक बैंकों के लिए ऋण सुविधा संशोधन के दिशा निर्देशों को जारी किया था। 
  • इसमें पूंजी बाजारों के मध्यस्थों (सीएमआई) को ऋण सुविधा से जोड़ा गया है।
  • यह संशोधन 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होगा। हालांकि बैंकों के पास इसे पहले अपनाने का विकल्प भी दिया गया है।  

 

ब्रोकिंग कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा?

रेटिंग्स एजेंसी क्रिसिल ने इन बदलावों के असर के बारे में विश्लेषण करते हुए बताया है कि, यह बदलाव बैंकों को ब्रोकिंग कंपनियों व प्रोप ट्रेडिंग को दी जाने वाली क्रेडिट सुविधाओं के बारे में निर्देश देता है। ये यह भी बताता है कि सीएमएस को कोई भी क्रेडिट सुविधा देते समय, बैंकों को किस सीमा तक और किस तरह के कोलैटरल रखना होगा। हमारा अनुमान है कि इस फैसले का सीधा असर उन ब्रोकिंग कंपनियों पर पड़ेगा, जो बैंकों से उधार लेकर ग्राहकों को मार्जिन फंडिंग देती थीं। अब उन्हें अतिरिक्त पूंजी की व्यवस्था करनी होगी या फिर अपने लेंडिंग मॉडल में बदलाव करना पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे शॉर्ट-टर्म में ट्रेडिंग वॉल्यूम पर असर पड़ सकता है, खासकर हाई-लीवरेज सेगमेंट में। हालांकि लंबी अवधि में यह कदम बाजार को अधिक स्थिर और सुरक्षित बनाने में मदद कर सकता है।

प्रोप ट्रेडिंग के लिए क्या निर्देश?

आरबीआई के दूसरे बड़े फैसले के तहत बैंकों को प्रोपाइटरी ट्रेडिंग के लिए सीधे फंडिंग देने पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया है। प्रोप ट्रेडिंग वह व्यवस्था है, जिसमें कोई ब्रोकिंग फर्म या वित्तीय संस्था अपने ही पैसे से बाजार में ट्रेड करती है ताकि मुनाफा कमा सके। जब इस तरह की गतिविधियों के लिए बैंक फंडिंग का इस्तेमाल होता है, तो जोखिम और बढ़ जाता है क्योंकि बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर बैंकिंग सिस्टम पर पड़ सकता है। इसी जोखिम को देखते हुए आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि बैंकों का पैसा सट्टा आधारित गतिविधियों में नहीं लगाया जाना चाहिए।

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