रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा को लेकर जीटीआरआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरे का फोकस पारंपरिक कूटनीति नहीं, बल्कि जोखिम प्रबंधन, सप्लाई चेन सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता होगा। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा वैश्विक तनाव और बंटी हुई अर्थव्यवस्थाओं के बीच दोनों देशों की प्राथमिकता निर्भरता को समझदारी से बनाए रखना है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव का कहना है कि इस यात्रा से सीमित स्तर पर रिश्तों में सुधार से लेकर क्षेत्रीय आर्थिक ढांचे में बड़े बदलाव जैसी संभावनाएं खुल सकती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, यह मुलाकात भारत-रूस साझेदारी को नई दिशा देने के साथ बदलते वैश्विक समीकरणों में संतुलन बनाने की कोशिश का भी हिस्सा है।
GTRI ने यात्रा के परिणामों को दो प्रमुख परिदृश्यों में बांटा है।
परिदृश्य 1: सतर्क लेकिन व्यावहारिक प्रगति
सबसे संभावित परिदृश्य के रूप में इसे देखा जा रहा है। इसमें भारत मौजूदा रक्षा सहयोग को मजबूत करने पर फोकस करेगा, मुख्य सैन्य प्लेटफॉर्म्स जैसे लड़ाकू विमान, टैंक और पनडुब्बियों के लिए डिलीवरी टाइमलाइन, मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट और तकनीकी अपग्रेड पर ठोस समझौते संभव हैं।
रिपोर्ट के अनुसार भारत की रूस को वार्षिक निर्यात राशि महज पांच अरब डॉलर है, जबकि आयात करीब 64 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसका बड़ा हिस्सा ऊर्जा है। वित्त वर्ष 2024 में 4.3 अरब डॉलर का निर्यात वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 4.9 अरब डॉलर हुआ है, लेकिन व्यापार असंतुलन जस का तस है।
ऊर्जा आयात में रूस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है, 2024 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रूस से आया। 2021 में रूसी कच्चे तेल पर भारत का खर्च 2.3 अरब डॉलर था, जो 2024 में बढ़कर 52.7 अरब डॉलर हो गया। यह वैश्विक ऊर्जा स्रोतों में सबसे तेज बदलावों में से एक है।
भुगतान लेनदेन में डॉलर का इस्तेमाल लगातार घट रहा है। भारत और रूस अब दिरहम, रुपये और युआन के माध्यम से भुगतान कर रहे हैं। इसका कारण पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच उभरी वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था है।