Reserve bank of India: आरबीआई
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महंगाई रोकने के लिए कौन सा भरोसा दे रही है सरकार और भाजपा?
महंगाई के सवाल पर केंद्र सरकार के मंत्री और अधिकारी अभी कुछ नहीं बोलना चाहते। आटा, दाल, चावल, दही, दूध आदि पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लगाए जाने के बाद एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री का बयान आया था। उन्होंने कहा कि इन वस्तुओं पर पहले भी जीएसटी लगता था। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बाद में 14 ट्वीट करके इस मुद्दे पर सफाई देने की कोशिश की। निर्मला सीतारमण ने कहा कि पहले सामान्य जरुरत की वस्तुओं पर वैट आदि के माध्यम से कर लिया जाता था। हालांकि उन्होंने कहा कि आटा, दाल जैसे 25 किग्रा तक के पैकेट पर जीएसटी नहीं लगेगी। लेकिन वित्त मंत्री के इस बयान से तमाम अर्थशास्त्री इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि इससे आम जनता को कोई राहत नहीं मिलने वाली है। निर्मला के सामानांतर वित्त मंत्रालय के अधिकारी दबी जुबान से मानते हैं कि देश में मंहगाई है, लेकिन सब कुछ भारत के हाथ में नहीं है। एक संयुक्त सचिव के मुताबिक उदारीकरण के दौर में भारत अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। इसका असर तो आएगा।
दूसरी तरफ अर्थशास्त्र के मामले में समझ रखने वाले भाजपा के प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल इस मुद्दे पर ठीक से जवाब नहीं दे पा रहे हैं। जीएसटी की दरों को लेकर वह कहते हैं कि वित्त मंत्री ने इस मामले में जवाब दे दिया है। वह इस जवाब से संतुष्ट हैं। महंगाई के सवाल पर गोपाल कृष्ण अग्रवाल कहते हैं कि इससे इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि वह इसका एक बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय स्थितियों, कोरोना महामारी को मानते हैं। गोपालकृष्ण का कहना है कि महंगाई को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक कई प्रयास कर रहा है। ऐसा लग रहा है कि अगले कुछ महीनों में महंगाई पर काबू पाया जा सकेगा।
क्या जल्द मिल जाएगी मंहगाई से निजात?
भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। अर्थशास्त्री एसके सिंह को ऐसी कोई उम्मीद फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है। सिंह कहते हैं कि घरेलू स्तर पर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा संकेत कम दिखाई दे रहा है। गुरुचरण दास कहते हैं कि केंद्र सरकार उपाय कर रही है, उम्मीद है कि जल्द महंगाई पर काबू पाया जा सकेगा। हालांकि इसके लिए डालर के मुकाबले रुपये की स्थिति, कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय कारक महत्वपूर्ण हैं। यूरोप से लौटकर आए आरके छाबड़ा को भारतीय कारकों का अध्ययन करने के बाद लगता है कि महंगाई पर गंभीरता से काबू पाने की कोशिशों को लागू करने के बाद इसका असर दिखाई देने में दो-तीन महीने लग सकते हैं।