नोटबुक के आयात से घरेलू उद्योग की बढ़ी परेशानी।
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भारतीय नोटबुक (कॉपी) निर्माता इस समय एक गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। देश के छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) को बचाने के लिए ऑल इंडिया नोटबुक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने वाणिज्य मंत्रालय से तत्काल दखल देने की गुहार लगाई है। एसोसिएशन का कहना है कि दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों (आसियान) से भारी मात्रा में आ रहे सस्ते और टैक्स-फ्री नोटबुक आयात के कारण घरेलू उद्योग बर्बादी की कगार पर पहुंच गया है। अगर सरकार ने जल्द ही न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) लागू नहीं किया, तो स्थानीय स्तर पर नोटबुक बनाने वाली फैक्ट्रियों का बंद होना तय है।
क्या है नोटबुक निर्माताओं की वाणिज्य मंत्रालय से मुख्य मांग?
घरेलू उद्योग के हितों की रक्षा के लिए ऑल इंडिया नोटबुक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय को पत्र लिखा है। इस पत्र में एसोसिएशन ने आयातित नोटबुक पर तुरंत 'न्यूनतम आयात मूल्य' तय करने की मांग की है। निर्माताओं का मानना है कि एमआईपी लागू होने से विदेशी सप्लायर एक तय कीमत से कम पर भारतीय बाजार में माल नहीं बेच पाएंगे। इससे घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को एक समान अवसर (लेवल प्लेइंग फील्ड) मिल सकेगा और वे बाजार में अपनी हिस्सेदारी सुरक्षित रख पाएंगे।
शून्य टैक्स कॉरिडोर कैसे बना घरेलू लघु उद्योगों के लिए मुसीबत?
दरअसल, इस संकट की जड़ें साल 2010 में लागू हुए भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) में छिपी हैं इस समझौते के तहत आसियान देशों से आने वाले नोटबुक पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (बीसीडी) पूरी तरह से शून्य (0%) है। इसके साथ ही, घरेलू स्तर पर मिलने वाली कुछ टैक्स रियायतों और एफटीए के आपसी तालमेल के कारण एक ऐसा कॉरिडोर तैयार हो गया है जहां विदेशी सप्लायरों को शून्य फीसदी आईजीएसटी का भी फायदा मिल रहा है। विदेशी कंपनियां भारत के इसी शून्य-टैक्स कॉरिडोर का फायदा उठाकर घरेलू एमएसएमई को बाजार से बाहर धकेल रही हैं।
घरेलू बाजार पर इसका क्या और कितना गंभीर असर हो रहा है?
एसोसिएशन के मुताबिक, भारतीय बाजार इस समय आसियान क्षेत्र, विशेष रूप से इंडोनेशिया से आने वाले बेहद कम लागत वाले और तैयार (फिनिश्ड) नोटबुक से पटा पड़ा है। ये आयात 'शिकारी प्रकृति' (Predatory Pricing) के हैं, जिनका उद्देश्य बेहद कम दाम पर बाजार पर कब्जा करना है। भारत के स्थानीय एमएसएमई प्लेयर्स अपनी उच्च विनिर्माण लागत के कारण इन बिना टैक्स वाले सस्ते उत्पादों का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के, भारतीय उत्पादकों का अस्तित्व खतरे में है और वे अपरिहार्य रूप से पूरी तरह नष्ट होने के कगार पर खड़े हैं।
कौन-कौन से देश उठा रहे हैं टैक्स-फ्री रूट का फायदा?
भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौते के दायरे में आने वाले कुल 10 सदस्य देश हैं। इनमें इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यांमार और कंबोडिया शामिल हैं। एसोसिएशन का आरोप है कि मुख्य रूप से इंडोनेशिया जैसे देश इस टैक्स-फ्री आयात रूट का सबसे अधिक फायदा उठा रहे हैं और भारी मात्रा में तैयार कॉपियां (नोटबुक) भारतीय बाजारों में डंप कर रहे हैं।
भविष्य की क्या राह है और सरकार से क्या उम्मीदें हैं?
घरेलू उद्योग के पास अब बहुत सीमित समय बचा है। ऑल इंडिया नोटबुक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि बिना तत्काल सरकारी हस्तक्षेप के स्थानीय इकाइयों को बंद करना पड़ेगा, जिससे लाखों लोगों का रोजगार प्रभावित हो सकता है। अब गेंद वाणिज्य मंत्रालय के पाले में है कि वह घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के 'मेक इन इंडिया' के संकल्प को बचाए रखने के लिए न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) जैसी सुरक्षात्मक नीतियां कितनी जल्दी लागू करता है।