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Report: H-1B वीजा पर नए शुल्क का भारतीय IT कंपनियों पर पड़ेगा सीमित असर, मॉर्गन स्टैनली की रिपोर्ट में दावा

Mon, 22 Sep 2025 11:57 AM IST
रिया दुबे बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मॉर्गन स्टैनली की रिपोर्ट के अनुसार नए H-1B वीजा शुल्क नियमों का भारतीय आईटी कंपनियों पर फिलहाल बहुत कम असर पड़ेगा। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इंजीनियरिंग अनुसंधान एवं विकास (ईआरएंडडी) में लगी कंपनियों पर सबसे कम असर पड़ेगा, जबकि एलटीआईमाइंडट्री और एमफेसिस जैसी मिड-कैप आईटी फर्मों पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ सकता है।
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H-1B वीजा (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Adobestock
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विस्तार
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अमेरिका में नए H-1B वीजा शुल्क नियमों को लेकर चिंताएं जरूर जताई जा रही हैं, लेकिन मॉर्गन स्टैनली की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार इसका भारतीय आईटी कंपनियों पर फिलहाल बहुत कम असर पड़ेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह नियम केवल भविष्य के आवेदनों पर लागू होगा, इसलिए नजदीकी समय में न तो यात्रा योजनाओं पर असर होगा और न ही मौजूदा प्रोजेक्ट्स की स्टाफिंग पर कोई दिक्कत आएगी।

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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक नया नियम लागू किया है, जिसके तहत नए H-1B वीजा आवेदन करने पर एक लाख डॉलर (करीब 83 लाख रुपये) का अतिरिक्त शुल्क देना होगा। यह नियम 21 सितंबर से लागू होगा और फिलहाल 12 महीने तक चलेगा। इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। नया प्रावधान केवल भविष्य के आवेदनों पर लागू होगा। यानी पहले से स्वीकृत वीजा या मौजूदा वीजा धारकों पर इसका असर नहीं पड़ेगा।

भारतीय आईटी कंपनियों पर दबाव पड़ने की उम्मीद

मॉर्गन स्टैनली के मुताबिक, भारतीय आईटी कंपनियां, जिन्हें हर साल जारी होने वाले H-1B वीजा का लगभग 70% हिस्सा मिलता है। अगले तीन से छह साल में ज्यादा लागत के दबाव का सामना कर सकती हैं। चूंकि वीजा आमतौर पर तीन साल के लिए मान्य होता है और इसे तीन साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। इसलिए हर नवीनीकरण के साथ यह भारी अतिरिक्त खर्च कंपनियों के लिए चुनौती बन सकता है।

इन कंपनियों पर पड़ेगा सबसे कम असर

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इंजीनियरिंग अनुसंधान एवं विकास (ईआरएंडडी) में लगी कंपनियों पर सबसे कम असर पड़ेगा, जबकि एलटीआईमाइंडट्री और एमफेसिस जैसी मिड-कैप आईटी फर्मों पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ सकता है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल टेक्नोलॉजीज जैसी लार्ज-कैप कंपनियां अपने विविध परिचालन और मजबूत ऑफशोर क्षमताओं के कारण बेहतर स्थिति में हैं।

कंपनियां अपने बिजनेस मॉडल में ला रही बदलाव

पिछले एक दशक में, भारतीय आईटी कंपनियों ने अमेरिका में स्थानीयकरण और कनाडा व लैटिन अमेरिका में निकटवर्ती क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के साथ, वीजा पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की है। कोविड-19 महामारी के दौरान इस प्रवृत्ति में तेजी आई है, जिससे पहले से ही विदेशी निवेश में वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हम देख रहे हैं कि कंपनियां अपने बिजनेस मॉडल को जोखिम मुक्त करने और अमेरिका व अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में वीजा पर निर्भर आबादी के प्रति अपने जोखिम को कम करने की योजना पर काम कर सकती हैं।

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रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बढ़ी हुई लागत को कंपनियां आगे चलकर अपने क्लाइंट्स पर डाल सकती हैं, क्योंकि यह शुल्क सिर्फ भारतीय आईटी कंपनियों पर नहीं, बल्कि पूरे उद्योग पर लागू होगा। कॉन्ट्रैक्ट्स को नए सिरे से तय करके इस बोझ को कुछ हद तक संतुलित किया जा सकता है। साथ ही, हर अतिरिक्त भूमिका को ऑफशोर (भारत या अन्य देशों से) शिफ्ट करना भी लागत का दबाव कम करने में मदद करेगा।
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रिपोर्ट ने निष्कर्ष में कहा कि नया H-1B शुल्क नियम भले ही अनिश्चितता लेकर आया है, लेकिन यह लंबे समय में कंपनियों को डिलीवरी मॉडल बदलने और ऑफशोर रणनीतियों को तेजी से अपनाने की दिशा में फायदा भी पहुंचा सकता है।

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