अमेरिका में नए H-1B वीजा शुल्क नियमों को लेकर चिंताएं जरूर जताई जा रही हैं, लेकिन मॉर्गन स्टैनली की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार इसका भारतीय आईटी कंपनियों पर फिलहाल बहुत कम असर पड़ेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह नियम केवल भविष्य के आवेदनों पर लागू होगा, इसलिए नजदीकी समय में न तो यात्रा योजनाओं पर असर होगा और न ही मौजूदा प्रोजेक्ट्स की स्टाफिंग पर कोई दिक्कत आएगी।
मॉर्गन स्टैनली के मुताबिक, भारतीय आईटी कंपनियां, जिन्हें हर साल जारी होने वाले H-1B वीजा का लगभग 70% हिस्सा मिलता है। अगले तीन से छह साल में ज्यादा लागत के दबाव का सामना कर सकती हैं। चूंकि वीजा आमतौर पर तीन साल के लिए मान्य होता है और इसे तीन साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। इसलिए हर नवीनीकरण के साथ यह भारी अतिरिक्त खर्च कंपनियों के लिए चुनौती बन सकता है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इंजीनियरिंग अनुसंधान एवं विकास (ईआरएंडडी) में लगी कंपनियों पर सबसे कम असर पड़ेगा, जबकि एलटीआईमाइंडट्री और एमफेसिस जैसी मिड-कैप आईटी फर्मों पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ सकता है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल टेक्नोलॉजीज जैसी लार्ज-कैप कंपनियां अपने विविध परिचालन और मजबूत ऑफशोर क्षमताओं के कारण बेहतर स्थिति में हैं।
पिछले एक दशक में, भारतीय आईटी कंपनियों ने अमेरिका में स्थानीयकरण और कनाडा व लैटिन अमेरिका में निकटवर्ती क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के साथ, वीजा पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की है। कोविड-19 महामारी के दौरान इस प्रवृत्ति में तेजी आई है, जिससे पहले से ही विदेशी निवेश में वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हम देख रहे हैं कि कंपनियां अपने बिजनेस मॉडल को जोखिम मुक्त करने और अमेरिका व अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में वीजा पर निर्भर आबादी के प्रति अपने जोखिम को कम करने की योजना पर काम कर सकती हैं।