नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने एस्सेल ग्रुप के अध्यक्ष सुभाष चंद्रा की याचिका पर लेनदारों को नोटिस जारी किया है। इस मामले की अगली सुनवाई 29 और 30 अक्तूबर को तय की गई है। चंद्रा ने नेशनल कंपनी लॉ न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के 1 सितंबर, 2026 के एक आदेश को चुनौती दी है। एनसीएलटी ने उनके व्यक्तिगत दिवाला मामले में एक तीसरे निर्णायक न्यायाधीश के आदेश पर रोक लगा दी थी।
एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ ने 23 सितंबर को सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत दिवाला मामले में जांच एजेंसी सीबीआई को नोटिस जारी किया था। पीठ ने कहा था कि एस्सेल ग्रुप के अध्यक्ष को संपत्ति बेचने से रोकने वाला अंतरिम निर्देश अंतिम निर्णय तक जारी रहेगा। सीबीआई ने सुभाष चंद्रा के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की है। उन पर लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (एलआईसीएचएफएल) से ऋण लेने के लिए अपनी निवल संपत्ति कथित तौर पर बढ़ाने का आरोप है। सीबीआई के अनुसार, चंद्रा ने सार्वजनिक क्षेत्र के ऋणदाता को 1,322 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान पहुंचाया है। एलआईसीएचएफएल ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि चंद्रा ने 980 करोड़ रुपये के दो ऋणों की मंजूरी और वितरण के लिए निवल संपत्ति प्रमाण पत्र जमा किए थे।
सुभाष चंद्रा ने एनसीएलएटी में अपनी याचिका में तर्क दिया है कि एनसीएलटी का 1 सितंबर, 2026 का आदेश उसकी वैधानिक शक्ति से अधिक था। चंद्रा ने एनसीएलटी द्वारा पांच सदस्यीय पीठ के गठन पर भी सवाल उठाया है। इससे पहले, एनसीएलटी में दो सदस्यीय पीठ ने चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया पर विभाजित फैसला सुनाया था। न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज ने चंद्रा द्वारा प्रस्तुत 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी थी। उन्होंने कहा था कि चंद्रा व्यक्तिगत गारंटर के लिए दिवाला ढांचे के तहत राहत पाने के पात्र हैं। हालांकि, तकनीकी सदस्य रीता कोहली ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
रीता कोहली के प्रस्ताव को अस्वीकार करने से कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 419(5) के तहत एक संदर्भ उत्पन्न हुआ। यह धारा विभाजित फैसले को हल करने की प्रक्रिया निर्धारित करती है। इसके तहत मतभेदों के बिंदुओं को न्यायाधिकरण के अतिरिक्त सदस्यों को बहुमत के निर्णय के लिए भेजा जाता है। यह मामला बाद में न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा के समक्ष रखा गया था। शर्मा ने मुख्य मुद्दों पर भारद्वाज से सहमति व्यक्त की और चंद्रा की पुनर्भुगतान योजना को बरकरार रखा। इस योजना के तहत व्यक्तिगत गारंटी से उत्पन्न लगभग 22,006 करोड़ रुपये के दावों को करीब 6.5 करोड़ रुपये में निपटाने का प्रस्ताव था। हालांकि, शर्मा के आदेश पर बाद में पांच सदस्यीय एनसीएलटी पीठ ने रोक लगा दी थी।