अगले महीने पेश होने जा रहे बजट में केंद्र सरकार से सुक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योग (एमएसएमई) सेक्टर की बड़ी अपेक्षाएं हैं। यह सेक्टर कारोबार में बढ़ रही परेशानियों को कम करने के मांग कर रहा है। एमएसएमई से जुड़े कई क्षेत्रों में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना तो लागू है, लेकिन कई कारोबार जो आयात पर निर्भर है उनको भी प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना के तहत लाने की मांग हो रही है।
छोटे और मंझोले उद्योग एमएसएमई क्षेत्र में फंसे पेमेंट के लिए बने नियम (धारा 43बी) के तहत 45 दिनों में भुगतान करने में बड़ी कंपनियों के साथ सरकारी निगमों को भी शामिल करने की मांग कर रहे हैं। बड़े उद्यम एमएसएमई उद्योगों से खरीदारी करते हैं, लेकिन पेमेंट समय पर नहीं देते। इसलिए इसका समाधान जरूरी है। एमएसएमई विनिर्माण इकाइयों के लिए कर में राहत देने की भी मांग सरकार से की गई है। देखा जाए तो यह सेक्टर देश के सकल घरेलू उत्पाद में 29 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है और रोजगार देने महत्वपूर्ण भूमिका इस क्षेत्र की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार एमएसएमई क्षेत्र 11.10 करोड़ नौकरियों में से 360.41 लाख से अधिक नौकरियां पैदा करता है।
चेम्बर ऑफ एसोसिएशन्स ऑफ महाराष्ट्र इंडस्ट्री एंड ट्रेड के अध्यक्ष दीपेन अग्रवाल का कहना है कि देश में मैन्युफेक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए कई क्षेत्र में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना के अंतर्गत लाने की जरूरत है, विशेषकर वे कारोबार जो आयात पर निर्भर करते हैं। इससे घरेलू बाजार में मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा, जो सामान आयात किया जाता है उस पर निर्भरता कम हो जाएगी। साथ ही एमएसएमई क्षेत्र में वे क्षेत्र जो सबसे अधिक नौकरियां प्रदान करते हैं उनको आसानी से ऋण उपलब्ध करावाने पर जोर दिया जाए, क्योंकि सरकार कोलेटरल फ्री लोन की नीति के बाद भी एमएसएमई को अभी भी ऋण लेने में चुनौतियों का सामाना करना पड़ रहा है। इसके अलावा बैंकों द्वारा उच्च ब्याज दर वसूली जाती जिसकी वजह से कारोबारियों को परेशानी होती है। वहीं एमएसएमई क्षेत्र में पेमेंट के फंसने की समस्या बनी हुई है, जिसमें अधिकतर भुगतान सरकारी की ओर से कारोबारियों की माल की खरीदारी करने पर नहीं दिए जाते हैं, इसलिए आगमी बजट में सरकार ने जो एमएसएमई पेमेंट को लेकर कानून बनाया था, उसमें बड़ी कंपनियां और कारोबारी ही नहीं सरकारी खरीदारी करने वाले निगमों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
कारोबारियों का का कहना है कि हमने निर्यातकों ने निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं- ब्याज इक्वलाइजेशन को जारी रखने का अनुरोध सरकार से किया है, जो 31 दिसंबर को खत्म हो गई है। साथ ही कुछ निर्यात वस्तुओं के लिए मार्केटिंग व ट्रेड प्रमोशन के लिए अतिरिक्त फंड, एमएसएमई विनिर्माण इकाइयों के लिए कर में राहत देने की मांग की है। उद्योग के जानकारों का कहना है कि इस बजट में सरकार कार्बन उत्सर्जन को कम करने में एमएसएमई की सहायता के लिए एक नीति आगामी बजट में पेश करने वाली है। जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी और सस्टेनएबल पर्यावरण पर ध्यान केंद्रीत किया जाएगा। जिसके लिए एक निकाय का गठन भी होने की संभावना है।
मुंबई मर्चेंट एसोसिएशन के सदस्य योगेश झा का कहना है, बैंकों के लिए समय-समय पर दिए गए कोलेटरल फ्री लोन की संख्या और राशि का खुलासा करना अनिवार्य किया जाना चाहिए। आगामी बजट में एमएसएमई को क्रेडिट फ्लो बढ़ाने के लिए अतिरिक्त आवंटन या शुद्ध प्रावधान की आवश्यकता है। भारत मर्चेंट चेम्बर के राजीव सिघंल का कहना कि कौशल विकास संबंधी सुधार की पहल के तहत जिला स्तर पर विश्वविद्यालय बनाने और एमएसएमई के लिए एकीकृत टाउनशिप बनाने की पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इससे कारोबार को गति मिलेगी।
एंजल निवेशक और कॉम्सक्रेडिबल के संस्थापक अमन ढल्ल के अनुसार सरकार को बजट 2025 में 'स्टार्ट-अप इंडिया' को बढ़ावा देना चाहिए। उन्होंने अपील की है कि स्टार्टअप से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाकर टैक्स में राहत दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा, "उम्मीद है कि केन्द्रीय बजट 2025-26 में सेक्शन 80-एआईएसी के तहत कर में छूट के प्रावधान में सुधार लाए जाएंगे, क्योंकि इनसे केवल 1 फीसदी मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप्स को ही फायदा मिल रहा है। हालांकि 1.6 लाख स्टार्ट-अप्स को मान्यता प्राप्त है, इसके बावजूद उन स्टार्ट-अप्स की संख्या बेहद कम है, जो इस छूट से लाभान्वित हो रहे हैं। ऐसे में ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ का लेबल सिर्फ एक लेबल बन कर ही रह गया है। जिससे उन्हें कुछ खास फायदे नहीं मिल रहे हैं।"