खपत और मांग बढ़ाने के लिए जनता की जेब में पैसा पहुंचाना जरूरी
नई केंद्र सरकार के पहले बजट में वित्त मंत्रियों के हाथ बंधे नहीं होते। राजकोषीय घाटा तब इतना डरावना नहीं लगता। अगले चार बजटों में कमीबेशी दुरुस्त करने का बेफिक्री भी होती है। इसलिए सौगात लुटाने की हिम्मत पहले बजट में दिखा दी जाती है।
कांग्रेस हार भले ही गई हो, लेकिन उसके बहत्तर हजार के नारे ने डरा दिया था। इसलिए किसानों के लिए कुछ ठोस करना नई सरकार का पहला काम होना चाहिए। किसानों के खातों में सम्मान निधि का कुछ हिस्सा पहुंच गया है लेकिन बात भूखों को उपहार में मछली देने से नहीं, मछली पकड़ना सिखाने से बनती है। सवाल यही है कि फसल का उचित दाम किसान को मिले और ग्रामीण अर्थतंत्र में खपत और मांग सुधरे - इसके लिए क्या हो।
जीडीपी ग्रोथ पर रखनी होगी नजर
पिछली पांच छह तिमाहियों में जीडीपी ग्रोथ आंकड़ा उदास करता रहा है। दिसंबर में यह छह फीसदी पर सिमट गया था। बेरोजगारी की दर बढ़ रही थी और कारखाना उत्पादन की गिर रही थी। जीएसटी कर ढांचे की ऊपरी दरें पचास फीसदी के पास पहुंच कर इतनी मदमस्त हो चली थीं कि आटो सेक्टर का दम निकलने के कगार पर था। किसानों का असंतोष चरम पर था क्योंकि फसल कौड़ियों के भाव बिक रही थी या खलिहान में सड़ रही थी। ऐसे में विपक्ष बार-बार नोटबंदी का गड़ा मुर्दा उखाड़ लाने को तैयार था। बेरोजगारी और हताशा में नेगेटिव कैंपेन खूब बिकता है।
रोजगार पर करना होगा काम
पूर्ण बजट में शुरुआत इन्हीं से करनी होगी। सरकारी नौकरियों की वेकेंसी उम्मीद के पेड़ पर सबसे नीचे लटक रहे फल हैं। उन्हें महज उचक कर पकड़ा जा सकता है। फिर असली काम लेकिन मुश्किल काम पर निगाह जमानी होगी। एक्सपर्ट बिरादरी हजार बार कह चुकी है कि कृषि एक सीमा के बाद रोजगार नहीं दे सकती। उसकी जोत लगातार घट रही है। असली आश्वासन कारखाने देते हैं। ज़रुरत छोटे और मध्यम उद्योगों को संजीवनी देने की है। मैन्युफैक्चरिंग को खाद-पानी देने की है।
कंसट्रक्शन इंडस्ट्री रोजगार की दूसरी सबसे बड़ी खान होती है। सड़क-पुल-बिजली यानी इन्फ्रास्ट्रक्चर भी एक हाथ से निवेश लेकर दूसरे हाथ से रोजगार वापस करता है। एक्सपर्ट कह रहे हैं कि `मेक इन इंडिया` कैंपेन ही बेरोजगारी के कैंसर का स्थायी इलाज कर सकता है। उसे फिर सरकार के अग्रिम मोर्चे पर लाना होगा।