आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में एक गंभीर मुद्दा उठाते हुए बैंकों द्वारा पिछले तीन वर्षों में न्यूनतम बैंक खाते की शेष राशि न रखने पर वसूले गए भारी जुर्माने पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने कहा कि यह राशि अमीरों या बड़े कर्जदारों से नहीं, बल्कि सिस्टम में सबसे गरीब खाताधारकों से वसूली गई है, जिनका एकमात्र अपराध यह था कि उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे।
सांसद चड्ढा ने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया कि यह जुर्माना उन लोगों पर लगाया गया है जो सबसे ज्यादा आर्थिक रूप से कमजोर हैं। उन्होंने विशेष रूप से किसानों, पेंशनरों और दिहाड़ी मजदूरों का उल्लेख किया, जिनके खातों में न्यूनतम राशि कम होने पर भी भारी जुर्माना लगाया गया। उन्होंने कहा कि पेंशनर जब अपनी दवाइयों के लिए पैसे निकालते हैं, तब भी उन पर जुर्माना लगता है, और दिहाड़ी मजदूर के खाते में कुछ सौ रुपये कम होने पर भी उनसे पैसे वसूले जाते हैं।
राघव चड्ढा ने वित्तीय समावेशन के मूल उद्देश्य पर भी सवाल उठाया। उनका मानना है कि वित्तीय समावेशन का लक्ष्य छोटी बचत की रक्षा करना होना चाहिए, न कि छोटे बैंक बैलेंस वाले लोगों को दंडित करना। उन्होंने कहा कि गरीब लोग बैंकों में अपना पैसा सुरक्षा के लिए रखते हैं, और उन्हें उनकी गरीबी के लिए चुपचाप दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
सांसद चड्ढा ने संसद में न्यूनतम बैलेंस पेनल्टी को खत्म करने का प्रस्ताव रखा है। उनका मानना है कि इससे बैंकिंग सिस्टम उन लोगों से पैसे लेना बंद कर देगा जो पहले से ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। यह कदम गरीबों को राहत देगा और वित्तीय समावेशन को उसके वास्तविक अर्थ में साकार करेगा।
चड्ढा ने कहा कि बैंक खातों का मकसद नागरिकों को फाइनेंशियल सुरक्षा देना होता है, लेकिन कई मामलों में वे फाइनेंशियल तनाव का जरिया बनते जा रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, "फाइनेंशियल इंक्लूजन का मकसद छोटी बचत की सुरक्षा करना होना चाहिए, न कि कम बैलेंस होने पर लोगों को सजा देना। बैंक खातों का मकसद हमें फाइनेंशियल सुरक्षा देना है, लेकिन आजकल वे कई लोगों को फाइनेंशियल सुरक्षा देने के बजाय फाइनेंशियल तनाव दे रहे हैं।" आप नेता ने संसद में यह प्रस्ताव रखा है कि न्यूनतम बैलेंस न रखने पर लगने वाले जुर्माने को खत्म कर दिया जाना चाहिए, ताकि बैंकिंग सिस्टम लोगों से उनकी गरीबी के लिए पैसे वसूलना बंद कर दे।