बिमल जालान समिति ने भारतीय रिजर्व बैंक ( RBI ) को वित्त वर्ष को 2020-21 से मौजूदा जुलाई-जून से बदलकर देश के वित्त वर्ष के मुताबिक यानी अप्रैल से मार्च करने की सिफारिश की है।
इस संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे रिजर्व बैंक को सरकार को अंतरिम लाभांश देने की जरूरत कम रह जाएगी। इतना ही नहीं, समिति ने अपनी सिफारिशों में यह भी कहा है कि रिजर्व बैंक की आर्थिक पूंजी व्यवस्था की प्रत्येक पांच साल में समीक्षा की जानी चाहिए। समिति ने कहा है कि इससे सरकार को अधिशेष हस्तांतरण के मामले में अधिक स्थायित्व आएगा।
समिति ने कहा है कि केंद्रीय बैंक के ऐसे बफर स्टॉक जिसमें कोई प्राप्ति नहीं हुई है, उसका हस्तांतरण नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि इसका इस्तेमाल बाजार जोखिम के समक्ष जोखिम बफर के तौर पर किया जाना चाहिए।
समिति ने 14 अगस्त को सौंपी थी रिपोर्ट
बता दें कि केंद्रीय बैंक ने मंगलवार को ही समिति की रिपोर्ट जारी कर दी थी। समिति ने 14 अगस्त को गवर्नर शक्तिकांत दास को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।
इसलिए हुआ था समिति का गठन
बिमल जालान रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर हैं। आरबीआई के मौजूदा आर्थिक पूंजी के नियम ( ईसीएफ ) की समीक्षा के लिए सरकार के साथ विचार विमर्श कर रिजर्व बैंक ने समिति का गठन किया था।
हाल ही में गवर्नर शक्तिकांत दास की अध्यक्षता में आरबीआई बोर्ड ने 1,76,051 करोड़ रुपये केंद्र सरकार को देने की मंजूरी दी थी। भारतीय रिजर्व बैंक अपने सरप्लस रिजर्व में से 1.76 लाख करोड़ रुपये केंद्र सरकार को देगा। आरबीआई के 84 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार होने जा रहा है।
समिति में शामिल हैं ये लोग
आरबीआई के पूर्व गवर्नर बिमल जालान के अलावा इस समिति में पूर्व डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन, वित्त सचिव राजीव कुमार, केंद्रीय बैंक के डिप्टी गवर्नर एन एस विश्वनाथन और सेंट्रल बोर्ड के दो सदस्य भरत दोशी और सुधीर मनकड़ भी शामिल हैं।