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ईरान में जंग: भारत के आर्थिक विकास की गति पर ब्रेक लगने का खतरा, सरकार की रिपोर्ट में तेल-गैस की कीमत पर क्या?

Sat, 28 Mar 2026 08:43 PM IST
Jyoti Bhaskar बिजनेस डेस्क, अमर उजाला।

सार

पश्चिम एशिया में करीब एक महीने से जारी संघर्ष का असर भारत पर भी पड़ने की आशंका है। आर्थिक विकास की गति धीमी होने का खतरा है। संघर्ष के कारण तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। सरकार की रिपोर्ट में क्या कहा गया, जानिए इस खबर में?
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भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन (फाइल) - फोटो : ANI
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विस्तार
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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण भारत में महंगाई बढ़ने और विकास की गति धीमी होने का खतरा बढ़ गया है। भारत सरकार ने शनिवार को जारी अपनी मासिक आर्थिक रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया संकट के चलते देश की आर्थिक विकास पर दर बुरा असर पड़ सकता है। 1 अप्रैल से शुरू होने वाले आगामी वित्तीय वर्ष के लिए 7.0 फीसदी से 7.4 फीसदी की वृद्धि के अनुमान में अब गिरावट का खतरा है।

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अमेरिका और इस्राइल की ओर से ईरान पर हमले के बाद एक महीने पहले शुरू हुए इस संघर्ष ने महत्वपूर्ण जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित कर दिया है। इससे दुनिया के 20 फीसदी तेल का परिवहन होता है। इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा और माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है और आपूर्ति शृंखलाओं पर दबाव बढ़ गया है। सरकारी समीक्षा में कहा गया है कि इससे भारत में मुद्रास्फीति और विकास को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापार घाटा प्रभावित हो रहा है।

CEA नागेश्वरन ने क्या कहा?
भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने रिपोर्ट में लिखा है कि अप्रैल और संभवतः मई के आंकड़ों से नए वित्तीय वर्ष के विकास की संभावनाओं की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी। उन्होंने कहा कि चालू खाता घाटा, जो मौजूदा वित्तीय वर्ष की अक्तूबर-दिसंबर तिमाही में पहले ही सकल घरेलू उत्पाद के 1.3 फीसदी तक बढ़ चुका है, अगले वित्तीय वर्ष में और भी बदतर हो जाएगा।
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कमजोर व्यवसायों-परिवारों को मदद की जरूरत
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को सबसे अधिक प्रभावित और कमजोर व्यवसायों और परिवारों को तत्काल, लक्षित राहत प्रदान करने की आवश्यकता होगी। घरेलू मांग अब तक अपेक्षाकृत स्थिर रही है, लेकिन विकास के जोखिम बढ़ रहे हैं, विशेष रूप से आयातित इनपुट पर निर्भर क्षेत्रों में। ऊर्जा संकट से जुड़े पूंजी के बाहर जाने और उच्च आयात लागत के कारण मार्च में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 95 तक कमजोर हो गया है।

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