हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत बड़े ईंधन और ऊर्जा संकट से बचने में सफल रहा। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) के पूर्व चेयरमैन बी. अशोक ने मंगलवार को यह बात कही।
बी. अशोक ने आगे बताया कि संकट शुरू होने से पहले भारत अपने कुल कच्चे तेल का लगभग 45 प्रतिशत आयात होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए करता था, जबकि 55 प्रतिशत अन्य क्षेत्रों से आता था। लेकिन कुछ ही सप्ताह में भारत ने गैर-होर्मुज स्रोतों से आयात बढ़ाकर 70 प्रतिशत कर दिया।
उन्होंने कहा कि यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि पिछले कई वर्षों की रणनीतिक तैयारी का परिणाम था। लगभग एक दशक पहले भारत केवल 27 देशों से कच्चा तेल आयात करता था, जबकि 2026 तक यह संख्या बढ़कर 41 देशों तक पहुंच गई। अलग-अलग देशों से तेल खरीदने के लिए केवल व्यापारिक समझौते ही नहीं, बल्कि विभिन्न कानूनी व्यवस्थाओं, बंदरगाहों और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप तैयारी भी करनी पड़ती है।
उन्होंने बताया कि सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में 10 रुपए प्रति लीटर की कटौती की, जिससे बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर काफी हद तक कम हो गया। इसके अलावा, तेल कंपनियों को खुद अतिरिक्त लागत वहन करने और खुदरा कीमतों को नियंत्रित रखने के निर्देश दिए गए। इसके लिए कंपनियों ने महंगे कच्चे तेल की खरीद के लिए अतिरिक्त पूंजी भी जुटाई।
उन्होंने कहा कि निजी रिफाइनरियों को ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतों का लाभ उठाकर बड़े पैमाने पर निर्यात करने से रोकने के लिए सरकार ने निर्यात शुल्क भी लगाया, ताकि घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे।
एलपीजी आपूर्ति को लेकर बी. अशोक ने कहा कि यह चुनौती कच्चे तेल से भी बड़ी थी। भारत अपनी एलपीजी जरूरत का लगभग 65 प्रतिशत आयात करता था, जिसमें करीब 90 प्रतिशत आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होती थी।
उन्होंने सरकार के फैसले की प्रशंसा करते हुए कहा कि संकट के दौरान केंद्र ने तुरंत एलपीजी कंट्रोल ऑर्डर लागू किया और घरेलू रिफाइनरियों को अधिकतम एलपीजी उत्पादन करने का निर्देश दिया। पेट्रोकेमिकल्स के लिए इस्तेमाल होने वाले हाइड्रोकार्बन को एलपीजी उत्पादन की ओर मोड़ दिया गया, जिससे घरेलू उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि हुई।
उन्होंने बताया कि केंद्र ने घरेलू उपभोक्ताओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, क्योंकि देश में करीब 90 प्रतिशत एलपीजी की खपत घरों में होती है। शुरुआत में व्यावसायिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं को सीमित आपूर्ति दी गई, लेकिन बाद में होटल, रेस्तरां और उद्योगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आपूर्ति को संतुलित किया गया।
बी. अशोक ने कहा कि संकट के दौरान भारत की संतुलित विदेश नीति और सभी संबंधित देशों के साथ मजबूत संबंधों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरकार ने विभिन्न देशों के साथ तेजी से उच्चस्तरीय कूटनीतिक बातचीत की, जिसके चलते संघर्ष के माहौल में भी एलपीजी और अन्य जरूरी ऊर्जा उत्पादों की आपूर्ति बाधित नहीं हुई।
उन्होंने बताया कि देश में अब लगभग 99 प्रतिशत घरों तक एलपीजी की पहुंच हो चुकी है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी घर में रसोई गैस की कमी न हो।
आईओसीएल के पूर्व चेयरमैन ने आगे आईएएनएस को बताया कि व्यावसायिक एलपीजी आपूर्ति सीमित होने के बाद घरेलू सब्सिडी वाले सिलेंडरों के गलत इस्तेमाल का खतरा बढ़ गया था, जिसे रोकने के लिए डिजिटल ऑथेंटिकेशन सिस्टम लागू किया गया, जिससे घरेलू सिलेंडरों की अवैध बिक्री पर प्रभावी रोक लगी और किसी भी क्षेत्र में एलपीजी की कमी नहीं होने दी गई।
बी. अशोक ने कहा कि सरकार ने आयातित एलपीजी पर निर्भरता कम करने के लिए पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) को भी तेजी से बढ़ावा दिया। भारत अपनी प्राकृतिक गैस की लगभग 50 प्रतिशत जरूरत घरेलू उत्पादन से पूरी करता है। जिन शहरों में पीएनजी नेटवर्क उपलब्ध था, वहां इसके उपयोग को प्रोत्साहित किया गया। उन्होंने कहा कि इससे भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा और अधिक मजबूत होगी।