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Indira IVF: खराब खानपान और देरी से शादी ने बढ़ाई इनफर्टिलिटी

Mon, 18 Jul 2022 05:59 AM IST
Jeet Kumar अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

निसंतानता और डॉक्टरों पर हमले को लेकर खुलकर बोले इंदिरा आईवीएफ के संस्थापक डॉ. अजय मुर्डिया...
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इंदिरा आईवीएफ के संस्थापक डॉ. अजय मुर्डिया - फोटो : Twitter
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विस्तार
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विज्ञान और मेडिकल चिकित्सा की उन्नति का नायाब उदाहरण है 'इन विट्रो फर्टिलाइजेशन' यानी आईवीएफ तकनीक। 1978 में इनफर्टिलिटी की दिशा में डॉक्टरों को बड़ी सफलता मिली। उस साल पहला टेस्ट ट्यूब बेबी पैदा होने के बाद अब तक दुनिया में इस तकनीक से 80 लाख से ज्यादा बच्चे पैदा हो चुके हैं।

  • अकेले अमेरिका में 80 हजार बच्चे सालाना आईवीएफ से जन्म ले रहे हैं। भारत में बीते पांच साल में इस तकनीक का इस्तेमाल सालाना 20 फीसदी तेजी से बढ़ा है और हर वर्ष दो-ढाई लाख आईवीएफ चक्रों को अंजाम दिया जा रहा है।
  • इसमें उदयपुर का इंदिरा आईवीएफ बड़ी भूमिका निभा रहा है। 2011 में शुरुआत के बाद आज यह सालाना करीब 1,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाली कंपनी बन चुकी है।

1978 में पहला टेस्ट ट्यूब (आईवीएफ) बेबी लुईस ब्राउन के पैदा होने के एक दशक बाद ही आपने इस क्षेत्र में कदम रख लिया था। क्या वजह थी?

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मैं सरकारी सेवा में था और आईवीएफ पर शोध कर रहा था। 1978 में पहले टेस्ट ट्यूब बेबी की खबर लैंसेट पत्रिका में प्रकाशित हुई। संयोगवश इस विषय पर मेरा लेख भी पत्रिका में साथ में छपा। इससे मेरा उत्साह बढ़ा और मुझे लगा कि आईवीएफ की दिशा में मैं कदम बढ़ा सकता हूं। 10 साल बाद मैंने नौकरी छोड़कर अपनी राह बनाने की ठानी और उदयपुर स्थित निवास पर ही आईवीएफ जांच एवं परामर्श केंद्र शुरू कर दिया।

80 के दशक में रुढ़िवादी समाज में इस संवेदनशील मुद्दे पर परामर्श कितना चुनौतीपूर्ण रहा?
काफी मुश्किलें आईं। सबसे पहले तो समाज में इस पर बात करना ही वर्जित था। लोग यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं थे कि इनफर्टिलिटी पुरुषों में भी हो सकती है। उनका मानना था कि यह महिलाओं की समस्या है। इस भ्रांति को तोड़ने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। धीरे-धीरे कुछ जोड़ों को समझ आने लगा और जब उनके सामने नतीजे आए तो वे संतुष्ट होने लगे। इसके बाद मरीज खुद चलकर परामर्श के लिए आने लगे और पुरुषवादी सोच से कुछ हद तक पार पाने में कामयाबी मिली।
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महज 5,000 रुपये से हजार करोड़ की कंपनी तक की यात्रा कैसे शुरू हुई?
मैंने जब नौकरी छोड़कर अपनी राह बनाने का फैसला लिया तो परिवार वालों और काफी साथियों ने रोका। कई साथी डॉक्टर तो घर पर आए कि अच्छी-खासी सरकारी नौकरी के बावजूद इतना बड़ा जोखिम क्यों ले रहा हूं। लेकिन मेरा इरादा पक्का था।

उदयपुर में तब मेरे पास दो कमरों का घर था और जेब में 5,000 रुपये। कंपनी के रूप में ऐसा कोई लक्ष्य दिमाग में नहीं था। मैंने आत्मविश्वास के साथ बेहिचक कदम बढ़ा लिया। न सिर्फ इंदिरा आईवीएफ नाम से परामर्श केंद्र शुरू किया बल्कि उस शुरुआती दौर में भारत का पहला स्पर्म (शुक्राणु) बैंक भी खोल दिया। इसके बाद मैंने देशभर में डॉक्टरों को आईवीएफ के बारे में प्रशिक्षण देना शुरू किया। अलग-अलग हिस्सों से पेशेवर जुड़ने लगे और एक सफर की शुरुआत हुई।

10 साल में इंदिरा आईवीएफ के 107 केंद्र बन गए हैं। इतना तीव्र विस्तार कैसे हुआ?
11 साल पहले हमने परामर्श से इलाज की ओर कदम बढ़ाया। समाज में निसंतानता का दंश मिटाने के लिए उदयपुर में ही इंदिरा आईवीएफ का पहला अस्पताल खोला। लेकिन, सुदूर राज्यों के काफी पीड़ित जोड़ों को उदयपुर का ही रुख करना पड़ता था। इससे उनका खर्च बढ़ता था। इसलिए हमने उनके आसपास ही इलाज मुहैया कराने की योजना पर काम शुरू किया। 2015 में नागपुर में दूसरा केंद्र शुरू हुआ। फिर सिलसिलेवार ढंग से कई राज्यों में केंद्र खुले और आज महज 10 साल के भीतर देशभर में इंदिरा आईवीएफ के 107 अस्पताल हैं।

इनफर्टिलिटी के किफायती इलाज के लिए क्या कदम उठा रहे हैं? आपका इलाज कितना सफल है?
हम असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) से इनफर्टिलिटी का इलाज करते हैं। एक आईवीएफ चक्र का खर्च डेढ़ से दो लाख रुपये आता है। यह विदेश में होने वाले खर्च के मुकाबले काफी कम है।

  • हमने इस तकनीक को किफायती बनाने के लिए लोगों की हमारी सेवाओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित की है ताकि उन्हें इलाज के लिए दूर न आना-जाना न पड़े।
  • हमारी सफलता दर सर्वाधिक 72 फीसदी तक रही है। अगर सरकार इसे बीमा में कवर कर दे तो बड़ी तादाद में लोगों को राहत मिल सकती है।

देश में इनफर्टिलिटी क्षेत्र सालाना 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। आप इसके मौजूदा बाजार को कैसे देखते हैं?
इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इनफर्टिलिटी बड़ी समस्या बन गई है। इससे निपटने के लिए बड़े पैमाने पर प्रभावी उपायों की दरकार है। अभी देश में 2.5 लाख चक्र हो रहे हैं, जो आने वाले वर्षों में बढ़कर 5 लाख हो जाएंगे। इंदिरा आईवीएफ इसमें बड़ी भूमिका निभाएगा। हमने अब तक एक लाख से ज्यादा सफल गर्भधारण कराए हैं। हम ऐसा करने वाले देश के पहले संस्थान हैं।

हमारे विशेषज्ञ सालाना 30,000 आईवीएफ चक्रों को अंजाम दे रहे हैं। बाजार के हिसाब से हमारी वृद्धि भी बीते तीन साल में 20 फीसदी के आसपास रही है। आगे भी इसे कायम रख पाएंगे क्योंकि हमारी बहुत भारी पूंजीगत जरूरतें नहीं हैं और न ही कोई कर्ज है। इसके चलते हम आसान और तेज विस्तार करते हुए इस क्षेत्र में अग्रणी बने रहेंगे।

बढ़ती इनफर्टिलिटी के कारण क्या है?
बदलती जीवनशैली, खराब खानपान और देरी से विवाह जैसे कुछ बड़े कारणों ने इनफर्टिलिटी को बढ़ाया है। आज युवक-युवतियां शादी से पहले करियर को तवज्जो देते हैं, जिसके चलते शारीरिक क्षमताएं दांव पर लगी रहती हैं। ज्यादा उम्र में अंडाणु-शुक्राणु की संख्या और क्षमता कम हो जाती है। यह स्थिति इनफर्टिलिटी को जन्म देती है।

मौजूदा हालात को देखते हुए यह देश में विकराल रूप लेकर महामारी का रूप ले सकती है। इसका सबसे बड़ा बचाव यही है कि जीवनशैली व खानपान में सुधार लाया जाए। अंडे व शुक्राणु फ्रीज कराने का भी उपाय है, ताकि जब जरूरत पड़े, तब संतान उत्पत्ति की जा सके।

इंदिरा आईवीएफ की आगे देश-विदेश में विस्तार की क्या योजना है?
हम एक लाख सफल आईवीएफ चक्र पूरे कर चुके हैं और जल्द इसे दो लाख कर देंगे। हम दुनियाभर के लोगों तक भौगोलिक पहुंच बढ़ा रहे हैं। हर साल 20 से 30 अस्पताल खोलने की योजना है। साथ ही, सफलता दर में इजाफा करते हुए मरीजों को संतुष्ट करना सबसे बड़ा लक्ष्य है। भारत के बाहर हम जल्द ही दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी देशों में अपने केंद्र स्थापित करने जा रहे हैं। साथ ही अगले साल शेयर बाजार में कंपनी का आईपीओ लाने की भी तैयारी है।

चुनौती की बात करें, तो...
तेजी से बढ़ते आईवीएफ क्षेत्र के सामने डॉक्टरों की कम संख्या बड़ी बाधा है। इसके लिए हम लगातार प्रशिक्षण देने में जुटे हैं। 2017 से इंदिरा फर्टिलिटी एकेडमी के तहत मलयेशिया, फिलीपीन, नेपाल, बांग्लादेश, जिम्बाब्वे और अन्य अफ्रीकी देशों के छात्र पढ़ रहे हैं। हमारी कोशिश है कि देश में पर्याप्त पेशेवर तैयार मुहैया कराए जाएं।

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