महामारी के दौरान अपने खर्चे पूरे करने के लिए करीब 77 फीसदी भारतीयों को कर्ज लेना पड़ा है। इसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी चिकित्सा और बच्चों की पढ़ाई की है। उपभोक्ता फाइनेंस कंपनी नोरी ने अपने सर्वे में बताया कि 28 फीसदी पर्सनल लोन मेडिकल इमरजेंसी के लिए, जबकि 25 फीसदी घरों की जरूरतों जैसे बच्चों की पढ़ाई, घर का रेनोवेशन और शादी के खर्च के लिए होते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ज्यादातर लोग ठीक-ठाक सैलरी कमाते हैं, जिससे केवल उनका रोजाना का खर्च पूरा होता है और अचानक होने वाले खर्च के लिए अतिरिक्त संसाधन नहीं होते हैं। ऐसे में 77 फीसदी लोग असुरक्षित पर्सनल लोन का इस्तेमाल करते हैं।
महामारी के दौरान 41 फीसदी लोगों ने कर्जदाता को चुनने के लिए ब्याज दर को मुख्य मापदंड बताया, जबकि 30 फीसदी ने लोन की अवधि और 20 फीसदी ने राशि मिलने में लगने वाले समय को प्राथमिकता दी। ज्यादातर लोगों के पास पारंपरिक तरीकों जैसे बचत खाते, फिक्स्ड डिपॉजिट और सोने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
इसमें से 40 फीसदी लोग सोने को निवेश के लिए प्राथमिकता देते हैं और केवल 12 फीसदी लोगों के पास इक्विटी और म्यूचुअल फंड्स जैसे निवेश विकल्प थे।