पश्चिम एशिया में लॉजिस्टिक चुनौतियों, कंटेनरों की किल्लत और बढ़ती माल ढुलाई लागत से जूझ रहे भारतीय चावल निर्यातकों ने एक बड़ा कारोबारी दांव खेला है। भारतीय चावल निर्यातक संघ (आईआरईएफ) ने सिंगापुर स्थित एक्सिमवाला सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर इराक को 1,02,210 टन बासमती चावल भेजने के लिए तीन बड़े मालवाहक जहाजों का विशेष प्रबंध किया है। इस रणनीतिक कदम से माल ढुलाई की लागत 350 डॉलर प्रति टन से घटकर सीधे करीब 90 डॉलर प्रति टन पर आ गई है। प्रति टन लगभग 260 डॉलर की इस भारी बचत से भारतीय निर्यातकों को कुल 2.66 करोड़ डॉलर (लगभग ₹223 करोड़) की सकल राहत मिलने का अनुमान है।
जहाजों के जरिए इराक चावल भेजने का पूरा लॉजिस्टिक प्लान क्या है?
पश्चिम एशिया के साथ व्यापार में जहाजरानी की बाधाओं और ऊंची लॉजिस्टिक लागत को दूर करने के लिए भारतीय निर्यातक संघ ने सामान्य कंटेनर परिवहन के बजाय बड़े मालवाहक जहाजों का रुख किया है। यह पूरी खेप इराक के उम्म कसर बंदरगाह पर उतारी जा रही है।
- एमवी लामार एस: यह पहला जहाज 36,810 टन बासमती चावल लेकर इराक के उम्म कसर बंदरगाह के तीसरे बर्थ पर लग चुका है और माल उतारने का काम शुरू हो गया है।
- एमवी लोलो गेट: यह दूसरा जहाज 25,500 टन बासमती चावल की खेप लेकर इराक के लिए रवाना होगा।
- एमवी आउटलैंडर: यह तीसरा और सबसे बड़ा जहाज 39,900 टन चावल लेकर अपनी यात्रा पूरी करेगा।
प्रस्तावित माल भाड़ा दरों के आधार पर इस नई लॉजिस्टिक व्यवस्था से कुल 2.66 करोड़ डॉलर की सकल बचत का अनुमान लगाया गया है, हालांकि वास्तविक बचत अंतिम लागत और खेप भेजने की शर्तों पर निर्भर करेगी।
भारतीय बासमती चावल के लिए कितना अहम है पश्चिम एशिया का बाजार?
आईआरईएफ के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल बासमती चावल निर्यात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेले पश्चिम एशिया के देशों में जाता है। इसलिए माल भाड़े में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी भारतीय निर्यातकों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर सीधा असर डालती है।
- बासमती निर्यात का कुल आंकड़ा: मार्च 2026 में समाप्त हुए वित्त वर्ष के दौरान भारत ने पश्चिम एशिया को 34,284 करोड़ रुपये मूल्य का 45.64 लाख टन बासमती चावल निर्यात किया था।
- गैर-बासमती सहित कुल व्यापार: गैर-बासमती चावल को मिलाकर पश्चिम एशिया को कुल 56.48 लाख टन चावल भेजा गया, जिसकी कुल वैल्यू 39,657 करोड़ रुपये रही।
- इराक और प्रमुख खरीदार देश: वित्त वर्ष 2025-26 में सऊदी अरब 8,324 करोड़ रुपये के आयात के साथ भारतीय बासमती का सबसे बड़ा बाजार रहा। इसके बाद ईरान (6,970 करोड़ रुपये), इराक (5,583 करोड़ रुपये) और संयुक्त अरब अमीरात (4,132 करोड़ रुपये) का स्थान रहा। इसी अवधि में इराक ने भारत से कुल 7.64 लाख टन बासमती चावल खरीदा था।
लॉजिस्टिक लागत घटने से निर्यातकों और अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
आईआरईएफ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग के मुताबिक, माल ढुलाई लागत को 350 डॉलर से घटाकर 90 डॉलर प्रति टन करने की यह पहल भारतीय निर्यातकों और विदेशी खरीदारों दोनों के लिए दोहरे फायदे का सौदा है।
- प्रतिस्पर्धा में सुधार: कंटेनर संकट के बीच बल्क कार्गो जहाजों के इस्तेमाल से भारतीय बासमती चावल खाड़ी देशों में प्रतिस्पर्धी दरों पर उपलब्ध हो सकेगा।
- अन्य खाड़ी देशों के लिए मॉडल: संघ का लक्ष्य केवल इराक ही नहीं, बल्कि सऊदी अरब और यूएई जैसे अन्य खाड़ी बाजारों के लिए भी ऐसे ही व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य लॉजिस्टिक मॉडल विकसित करना है।
- बीआईआरसी 2026 में मंथन: यह रणनीतिक कदम 23 से 25 अक्तूबर तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होने वाले 'भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन' (बीआईआरसी 2026) से ठीक पहले उठाया गया है, जहां बड़े जहाजों, बीमा, बंदरगाहों पर देरी और माल भाड़ा विवादों को सुलझाने पर वैश्विक मंथन होगा।
भारतीय चावल निर्यातक संघ (आईआरईएफ) द्वारा माल भाड़े में 74% की कटौती के लिए उठाया गया यह कदम भारतीय कृषि-निर्यात के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यदि बड़े मालवाहक जहाजों की उपलब्धता और पोर्ट हैंडलिंग सुचारू बनी रहती है, तो यह मॉडल पश्चिम एशिया में भारतीय बासमती के वर्चस्व को और मजबूत करेगा।