वैश्विक अर्थव्यवस्था में चल रही उथल-पुथल के बीच भारत के बाहरी खाते की तस्वीर सामने आई है। वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि देश को विदेशी मोर्चे पर चौथी तिमाही में थोड़ी राहत मिली है, लेकिन पूरे साल का हिसाब-किताब अभी भी दबाव में है। आइए, आसान बोलचाल की भाषा में 5 सवालों के जरिए समझते हैं कि भारत के व्यापार, विदेशी निवेश और रुपये को लेकर ये आंकड़े क्या कहानी कह रहे हैं।
वित्त वर्ष 2026 की आखिरी तिमाही (जनवरी-मार्च) में भारत ने 7.1 अरब डॉलर का 'करंट अकाउंट सरप्लस' दर्ज किया है, जो देश की जीडीपी का 0.7 प्रतिशत है। आसान शब्दों में कहें तो, इस दौरान भारत से बाहर जाने वाले पैसों के मुकाबले देश में ज्यादा पैसा आया। हालांकि, यह आंकड़ा पिछले साल की इसी तिमाही के 13.7 अरब डॉलर (जीडीपी का 1.4 प्रतिशत) के मुकाबले कम है।
सरप्लस में आई इस कमी का मुख्य कारण मर्चेंडाइज व्यापार घाटा (वस्तुओं के आयात-निर्यात का अंतर) का बढ़ना है। वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में व्यापार घाटा बढ़कर 83.4 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले साल इसी तिमाही में यह 59.3 अरब डॉलर था। हालांकि, इसी अवधि (जनवरी-मार्च 2026) में भारत के सेवा क्षेत्र ने शानदार प्रदर्शन किया और इसकी शुद्ध कमाई 53.3 अरब डॉलर से बढ़कर 60.4 अरब डॉलर हो गई, जिसने इस घाटे को काफी हद तक संतुलित कर दिया।
अगर हम पूरे साल की बात करें, तो स्थिति घाटे वाली है। पूरे वित्त वर्ष के लिए भारत का करंट अकाउंट घाटा जीडीपी का 0.6 प्रतिशत रहा। रकम के हिसाब से देखें, तो यह घाटा पिछले साल के 22.9 अरब डॉलर से बढ़कर इस साल 25.2 अरब डॉलर पर पहुंच गया है।
विदेशी निवेश को लेकर आंकड़े दोनों तरफ इशारा कर रहे हैं:
अर्थव्यवस्था के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां हैं- पश्चिम एशिया में बिगड़ता युद्ध और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें। इन दोनों वजहों से भारत का आयात बिल महंगा हो रहा है, जिससे रुपये की कीमत गिरने का जोखिम बढ़ गया है।