वैश्विक अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत-चीन के बीच बढ़ती व्यापारिक नजदीकी वाशिंगटन की बेचैनी में लगातार इजाफा करेगी। भारत-चीन क्षेत्रीय व्यापार ढांचा गढ़ते हैं, तो यह अमेरिका के लिए दोहरी चोट होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग की मुलाकात ने एशियाई व्यापारिक राजनीति की दिशा बदलने वाले संकेत दिए हैं। असली सवाल है, क्या भारत-चीन का संभावित आर्थिक तालमेल अमेरिका की उस रणनीति को चुनौती देगा, जिसे उसने इंडो-पैसिफिक में मजबूती से गढ़ा था?
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अमेरिकी और पश्चिमी थिंक टैंक का मानना है, भारत-चीन के बीच बढ़ती व्यापारिक नजदीकी वाशिंगटन की बेचैनी में लगातार इजाफा करेगी। वाशिंगटन का ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन कहता है कि भारत-चीन आपूर्ति शृंखला पर कामयाब साझेदारी करते हैं तो अमेरिका पर दोगुना दबाव पड़ेगा। लंदन का चैथम हाउस ने कहा, अमेरिका को समझ लेना चाहिए कि एशिया केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदार भी बन रहा है।
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस का कहना है, भारत-चीन क्षेत्रीय व्यापार ढांचा गढ़ते हैं, तो यह अमेरिका के लिए दोहरी चोट होगी। पहली, निर्यातकों पर प्रतिस्पर्धा का दबाव और दूसरी, इंडो-पैसिफिक में अमेरिकी क्षरण। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा, भारत-चीन में व्यापारिक गर्माहट एशियाई अर्थव्यवस्था के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। रूसी अर्थशास्त्री और ब्रिक्स के प्रमुख रणनीतिकार सर्गेई ग्लाजयेव ने कहा, भारत-चीन व रूस स्थानीय मुद्राओं या ब्रिक्स के वैकल्पिक भुगतान तंत्र का उपयोग करते हैं तो यह अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ नीतियों को अप्रभावी बना देगा।
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अमेरिकी मीडिया के भी तीखे तेवर
वॉल स्ट्रीट जर्नल : भारत-चीन नजदीकी अमेरिकी बाजारों पर सीधा दबाव डालेगी।
फाइनेंशियल टाइम्स : ट्रंप की टैरिफ नीति उलटी पड़ सकती है। संभव है कि भारत-चीन ऐसा ढांचा खड़ा कर दें जिससे अमेरिका को अपने ही खेल में शिकस्त मिले।
सीएनएन : यदि भारत-चीन के बीच व्यापारिक तालमेल बढ़ता है तो यह ट्रंप प्रशासन की टैरिफ रणनीति उलटी पड़ सकती है।
फॉक्स न्यूज : अमेरिकी लापरवाही से चीन की ओर भारत का झुकाव दिख रहा है। यह अमेरिका के लिए बड़ा संकट भी है, क्योंकि भारत जैसा भरोसेमंद सहयोगी आसानी से नहीं मिलता।
ले मोंद : भारत–चीन के बीच बढ़ती व्यापारिक गर्माहट ग्लोबल इकॉनमी का पॉवर शिफ्ट है। यह सहयोग अमेरिका के प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देगा और यूरोप के लिए भी कठिन सवाल खड़े करेगा कि वह किस धुरी के साथ खड़ा रहे।
भारत-चीन व्यापार का नया समीकरण
2022-23 में भारत–चीन का कुल व्यापार 135.98 अरब डॉलर तक पहुंचा।
2023-24 में यह 118.4 अरब डॉलर पर रहा, लेकिन चीन से आयात कहीं ज्यादा और भारत का व्यापार घाटा करीब 100 अरब डॉलर पर टिका रहा।
भारत मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स और सक्रिय औषधि सामग्री आयात करता है, जबकि लौह अयस्क, कपास और पेट्रोकेमिकल्स निर्यात करता है।
विशेषज्ञ मानते हैं, दोनों देश व्यापार घाटा संतुलित करने और तकनीकी क्षेत्रों में साझेदारी की ओर बढ़े तो अमेरिका के लिए यह रेड अलार्म होगा।
भारत-अमेरिका व्यापार परिदृश्य
ब्रुकिंग्स के अनुसार 2023-24 में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार लगभग 118 अरब डॉलर रहा। इसमें भारत ने अमेरिका को 78 अरब डॉलर का निर्यात किया और अमेरिका से 40 अरब डॉलर का आयात किया। इस लिहाज से भारत को अमेरिका के साथ लगभग 38 अरब डॉलर का सकारात्मक व्यापार संतुलन मिला है।
अमेरिकी बाजार भारत के लिए आईटी सेवाओं, फार्मा और इंजीनियरिंग गुड्स का सबसे बड़ा गंतव्य है, जबकि अमेरिका को भारत से रेडीमेड गारमेंट्स, आभूषण और ऑटो कंपोनेंट्स का भी बड़ा निर्यात होता है। ट्रंप के नए टैरिफ से भारत की यह बढ़त खतरे में आ सकती है।
अगर भारत-चीन आपसी तालमेल से एशिया में वैकल्पिक सप्लाई चैन मजबूत करते हैं, तो अमेरिकी आयातकों को झटका लगेगा और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता और ज्यादा मजबूत होगी।
भविष्य का सवाल : अमेरिका बनाम एशिया
विश्लेषक मानते हैं, अब खेल संतुलन का नहीं, बल्कि दबाव का है। अमेरिका चाहता है कि भारत उसकी इंडो-पैसिफिक रणनीति का स्थायी हिस्सा बने। लेकिन भारत-चीन सहयोग का कोई भी ठोस कदम इस रणनीति की जड़ें हिला देगा। यही कारण है कि वाशिंगटन और यूरोपीय थिंक टैंक मोदी-जिनपिंग मुलाकात को सतर्क नजर से देख रहे हैं। मुलाकात ने साफ कर दिया है कि भारत-चीन एशियाई व्यापार की नई दिशा तय कर सकते हैं। अगर सीमाएं शांत रहीं तो भारत-चीन का विशाल उपभोक्ता बाजार दोनों देशों के लिए वरदान बन सकता है।