जब भी भारत के मुक्त व्यापार समझौतों या द्विपक्षीय व्यापार समझौताओं (एफटीए या बीटीए) की बात होती है, तो सुर्खियों में अक्सर अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोपीय यूनियन ही रहते हैं। लेकिन इन बड़े समझौतों के शोर-शराबे से दूर, भारत बहुत ही खामोशी से दक्षिण अमेरिका में एक ऐसी डील को अमलीजामा पहनाने की तैयारी कर रहा है, जो रणनीतिक तौर पर पश्चिमी देशों के साथ होने वाली किसी भी डील से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यह समझौता है भारत और चिली के बीच।
सवाल: दोनों देशों के व्यापार के आंकड़े क्या कहते हैं? क्या हमें वाकई चिली की इतनी जरूरत है?
जवाब: दोनों देशों के व्यापार के आंकड़े साफ इशारा कर रहे हैं कि भारत को चिली के संसाधनों बहुत अधिक जरूरत है। वित्त वर्ष 2024-25 में चिली से भारत का आयात 72% बढ़कर 2.60 अरब डॉलर हो गया, जबकि वहां हमारा निर्यात घटकर 1.15 अरब डॉलर रह गया। यह भारी उछाल बताता है कि भारतीय उद्योगों वहां के कच्चे माल की सख्त जरूरत है। मुक्त व्यापार समझौता होने से भारत चिली से केवल कच्चा माल ही नहीं लाएगा, बल्कि वहां अपनी मूल्य वर्धित सेवाओं और वस्तुओं का निर्यात बढ़ाकर इस व्यापार घाटे को कम भी कर सकेगा।
सवाल: चिली के साथ भारत के समझौते को 'रणनीतिक बढ़त' क्यों कहा जा रहा है?
जवाब: क्योंकि आज सप्लाई चेन एक हथियार बन चुकी है। वैश्विक राजनीति में जिस तरह सप्लाई चेन को 'वेपनाइज' किया जा रहा है, उसे देखते हुए भारत के लिए 'रणनीतिक स्वायत्तता' बहुत जरूरी है। चिली के साथ यह समझौता भारत को एक डाइवर्सिफाइड और भरोसेमंद सप्लाई बेस देगा। जब बाकी दुनिया लिथियम के लिए संघर्ष कर रही होगी, तब भारत के पास एक सुरक्षित कॉरिडोर होगा। यही वह 'रणनीतिक बढ़त' है जो साधारण आंखों से छिप जाती है।
चिली के साथ होने वाला यह समझौता भले ही टीवी डिबेट्स का हिस्सा न बने, लेकिन यह भारत की 'मेक इन इंडिया' और 'ग्रीन ट्रांजिशन' की रीढ़ साबित हो सकता है। यह डील भारत को एक आयातक देश से बदलकर एक शक्तिशाली विनिर्माण वाला देश बनाने की दिशा में दूरगामी कदम साबित होगा।