दिसंबर 1993 में एक फिल्म आई थी, ‘धनवान’। उस फिल्म में करिश्मा कपूर हर चीज से डरती थीं और छोटी-छोटी बात को बढ़ा-चढ़ाकर गंभीर बीमारी तक पहुंचा देती थीं। फिल्म में जब मनीषा कोइराला उन्हें गाय का कच्चा और ताजा दूध पीने देती हैं, तो वह मना करते हुए कहती हैं, ‘इसमें बैक्टीरिया होता है। कच्चा दूध पीने से वह जिस्म में फैल जाता है, फिर आंतों पर असर करता है और आदमी मर जाता है।’
वहीं, जब करिश्मा बारिश में अपने दादाजी यानी कादर खान को भीगते हुए देखती हैं, तो कहती हैं, ‘बारिश बहुत खतरनाक होती है। भीगने से जुकाम हो जाता है। खांसी हो जाती है। खांसी से फेफड़ा सूज जाता है। सूजन से सांस बंद हो जाती है और फिर आदमी मर जाता है।’ तब कादर खान चिढ़ते हुए कहते हैं कि तू मेरी पोती है कि यमराज की पोती है। हर वक्त मरने-मारने की बात करती है।
इन 'ADD' को देख आप भी समझ नही पाएंगे बनाने वाले के दिमाग को, कहेंगे विज्ञापन है या फिर...
करिश्मा कपूर के उसी अंदाज को आज कई कंपनियां अपना प्रोडक्ट बेचने के लिए अपना रही हैं। विज्ञापन के जरिए लोगों के मन में एक तरह का डर पैदा किया जाता है। उन्हें बताने की कोशिश की जाती है कि उक्त प्रोडक्ट आपके लिए क्यों जरूरी है? अब कंपनियां भी अच्छी तरह से जान गई हैं कि वर्तमान समय का आम आदमी हर चीज से डरता है। उसे सबसे ज्यादा चिंता अपने परिवार की है। वह उन्हें हर बुरी चीज से बचाना चाहता है। वह कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहता है। वह हर उस चीज को खरीदने को तैयार है, जिससे उसके परिवार की रक्षा हो सके।
जब टीवी पर अलग-अलग के विज्ञापनों के जरिए, वह देखता है कि फलां प्रोडक्ट खरीदने से जान बच सकती है, तो वह बिना देर किए तुरंत उसे खरीद लेता है। वह यह नहीं देखता है कि यह प्रोडक्ट क्या सचमुच उसके लिए इतना जरूरी है? सेहत और सुरक्षा को लेकर डरना ठीक है, लेकिन जिंदगी में यह जानना भी जरूरी है कि हमें उन चीजों की कितनी जरूरत है?
नल का पानी मत पियो, वाटर प्यूरीफायर लगाओ, वरना बीमार पड़ जाओगे। दूषित हवाएं बीमार न कर दें, उससे पहले घर में एयर प्यूरीफायर लगाओ। कार में फलां टायर ही लगाओ, क्योंकि वही आपको अचानक होने वाले एक्सीडेंट से बचा सकते हैं। बीमारी वाले मच्छर रात ही नहीं, सुबह भी आते हैं, इसलिए दिन में भी जलने चाहिए मच्छर भगाने वाली मशीन। फलां तेल ही खाएं, वरना पति को कभी भी हार्ट अटैक हो सकता है। आपके बाद आपके परिवार का क्या होगा? ये इंश्योरेंस पॉलिसी ही आपके परिवार की रक्षा करेगी... ये हैं कुछ विज्ञापनों की भाषा, जो डर दिखाकर आपको प्रोडक्ट खरीदने के लिए उकसाते हैं।
छोटे-छोटे डर से भी होता है फायदा:आप बिना सनस्क्रीन लगाए बाहर न निकलें, तो काले हो जाएंगे। इस जूते को पहनकर दौड़ें, वरना पैरों को नुकसान होगा। इस साबुन से ही नहाएं, वरना स्किन की नमी चली जाएगी। इस लिक्विड सोप से ही हाथ धोएं, वरना कीटाणु हाथों के जरिए आपके पेट में चले जाएंगे। ये सब भी एक तरह का डर बेच रहे हैं। हालांकि, ये डर बहुत बड़े नहीं हैं, फिर भी लोगों में चिंता तो बढ़ाते ही हैं। कंपनियों ने इस तरह के विज्ञापन बनाकर आपकी पूरी जिंदगी को एक तरह से अपने कंट्रोल में ले लिया है। हालांकि, ये भी सच है कि लोग फायदा देखकर इतनी जल्दी प्रोडक्ट नहीं खरीदते, जितना नुकसान हो जाएगा, इस डर से खरीदते हैं। यही वजह है कि लोगों को अगर किसी चीज को खरीदने के लिए तैयार करना है, तो कंपनियां वह वजह तलाशती हैं, जिसके जरिए लोगों को डर दिखाया जा सके। इसके लिए बाकायदा उनकी एक रिसर्च टीम भी काम करती है।
ऐसा नहीं है कि सभी कंपनियां अपने फायदे के लिए ही लोगों को डराती हैं और प्रोडक्ट बेचती हैं। कई बार यह जरूरी भी हो जाता है। उदाहरण के लिए, इंश्योरेंस वाले विज्ञापन को ही ले लें। अगर मरने का डर न दिखाया जाए, तो लोग इंश्योरेंस ही नहीं करवाते, जो कि आज के समय में सबके लिए जरूरी हो गया है। सरकार भी ऐसे विज्ञापन बनवाती है, जिसमें लोगों को ट्रैफिक नियमों का पालन करने, हेलमेट पहनने, गुटखा-तंबाकू व सिगरेट का इस्तेमाल न करने, शौचालय का इस्तेमाल करने की सीख दी जाती है। इन सभी विज्ञापनों में एक्सीडेंट, मौत, कैंसर या अन्य बीमारी का डर दिखाया जाता है, जो बिल्कुल सही है। इसके बिना लोग जागरूक ही नहीं होते। डर का सहारा लेकर अगर लोगों में जागरूकता बढ़ती है, तो ऐसा किया जाना चाहिए।