भारत की पहली तिमाही की 7.8 प्रतिशत जीडीपी विकास दर को लेकर छिड़े राजनीतिक और नीतिगत विवाद में अब एक बेहद मजबूत और वैश्विक आर्थिक आवाज शामिल हो गई है। वर्ल्ड बैंक के कार्यकारी निदेशक (ईडी) नीलकंठ मिश्रा ने इन दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश की आर्थिक विकास दर वास्तव में केवल 2.6 प्रतिशत रही है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखे एक तीखे पोस्ट में मिश्रा ने इस तरह के तर्कों को कम समझ वाला और सरासर गलत करार दिया है। उन्होंने पूर्व वित्त सचिव एससी गर्ग के दावों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि देश की आर्थिक गतिविधियों के ऐसे ठोस और अचूक आंकड़े पेश किए गए हैं, जिन्हें किसी भी तरह से झुठलाया नहीं जा सकता।
पूर्व वित्त सचिव एससी गर्ग ने हाल ही में दावा किया था कि पिछले साल की पहली तिमाही की जीडीपी (वर्तमान कीमतों पर) को 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया था और यदि ऐसा नहीं किया गया होता, तो इस साल की पहली तिमाही की विकास दर महज 2.6 प्रतिशत ही दिखती। इस दावे पर कड़ा ऐतराज जताते हुए नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि वे इस तरह के दावों को देखकर स्तब्ध हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग इस क्षेत्र को करीब से ट्रैक करते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि बेस (आधार वर्ष के आंकड़ों) में यह संशोधन इस साल मार्च में ही स्पष्ट रूप से सामने आ गया था।
एक्सिस बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री रहे नीलकंठ मिश्रा ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि देश की जमीनी आर्थिक गतिविधियों से जुड़े जिन संकेतकों में हेरफेर करना नामुमकिन है, वे खुद भारत की मजबूत विकास यात्रा की गवाही दे रहे हैं। उन्होंने देश की प्रगति को प्रमाणित करने वाले निम्नलिखित आंकड़े पेश किए:
भविष्य के आर्थिक परिदृश्य पर बात करते हुए वर्ल्ड बैंक के ईडी ने एक बेहद सकारात्मक और उम्मीद से भरा नजरिया पेश किया है। उनके अनुसार, देश में बजटीय बाधाएं अब खत्म हो रही हैं और मौद्रिक नीतियां भी अब अनुकूल बन रही हैं। ऐसे में जीडीपी विकास दर उम्मीद से अधिक बेहतर प्रदर्शन कर रही है और आने वाले समय में देश की विकास दर का अनुमानित औसत7 प्रतिशत से ऊपर पहुंच जाएगा। उन्होंने अनुमान जताया कि यदि देश में राजकोषीय और मौद्रिक नीतियां तटस्थ भी बनी रहती हैं, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था7.5 प्रतिशत की विकास दर आसानी से हासिल कर सकती है।
यद्यपि देश का समग्र आर्थिक विकास बहुत मजबूत है, लेकिन नीलकंठ मिश्रा ने कुछ अनसुलझे मोर्चों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की अर्थव्यवस्था में अभी भी कुछ शिथिलता बची हुई है, जिसका सबसे बड़ा संकेत वास्तविक मजदूरी की धीमी वृद्धि दर है। मिश्रा के अनुसार, इस शिथिलता को पूरी तरह से दूर करने और श्रम बाजार को मजबूत करने के लिए देश को लगातार कई तिमाहियों तक औसत से अधिक की आर्थिक विकास दर बनाए रखनी होगी, ताकि बाजार पूरी तरह से चुस्त हो सके और भविष्य में महंगाई के दबावों को नियंत्रित रखा जा सके।
वर्ल्ड बैंक के कार्यकारी निदेशक नीलकंठ मिश्रा का यह बयान भारतीय अर्थव्यवस्था की जमीनी हकीकत को बयां करता है। उन्होंने न केवल जीडीपी के आंकड़ों पर उठाए जा रहे सवालों को तकनीकी रूप से गलत और कम समझ पर आधारित साबित किया, बल्कि वास्तविक वाहन बिक्री, टैक्स कलेक्शन और क्रेडिट ग्रोथ जैसे ठोस आंकड़ों से देश की साख को वैश्विक पटल पर प्रमाणित भी किया है। जब देश के जमीनी आर्थिक संकेतक इतने मजबूत हों, तो सांख्यिकी गणना पर राजनीतिक विवाद खड़ा करना केवल भ्रामक सूचनाओं को बढ़ावा देना है।