भारत और अमेरिका ने लंबे समय के इंतजार के बाद व्यापार समझौते की घोषणा की है। उम्मीद है कि इससे कारोबारी रिश्तों में सुधार आएगा क्योंकि अमेरिका आज भी भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार बना हुआ है। विशेषज्ञों और ब्रोकरेज रिपोर्ट बताती हैं समझौते के तहत अमेरिक ने भारतीय सामान पर पारस्परिक टैरिफ को पहले घोषित 25 प्रतिशत की दर की तुलना में घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है। इसके अलावा 25 प्रतिशत का पैनल्टी टैरिफ भी वापस ले लिया गया है। कुल मिलाकर टैरिफ बोझ जो 50 प्रतिशत था, वह अब घटकर 18 प्रतिशत हो गया है। मोतीलाल फाइनेंशियल लिमिटेड की रिपोर्ट ने कहा है कि इस समझौते से भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था को कई तरह से फायदा मिलेगा। इक्विटी मार्केट की नजर से देखें तो समझौते होने और हाल ही में भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते से भारत की स्थिति काफी मजबूत होती दिख रही है। इससे निर्यात वृद्धि को समर्थन मिलने, डॉलर के मुकाबले रुपये जारी गिरावट को कम करने, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को आकर्षित करने और मीडियम टर्म में करेंसी को स्थिर करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
वहीं मूडीज की रिपोर्ट बताती है इससे भारत के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। साल 2025 के पहले 11 महीनों में भारत के कुल वस्तु निर्यात का लगभग 21 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका को गया। इसके अलावा, कम शुल्क दर रत्न व आभूषण, कपड़ा और परिधान जैसे श्रम-प्रधान सेक्टर के लिए भी सकारात्मक साबित होगा। मूडीज ने यह भी चेताया कि अगर भारत रूसी तेल से पूरी तरह हटकर अन्य स्रोतों पर निर्भर हो जाता है, तो इससे तेल की आपूर्ति और कड़ी हो सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके चलते महंगाई पर भी दबाव बढ़ने का खतरा रहेगा।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों में सुधार
बजाज ब्रोकिंग की रिपोर्ट के अनुसार भारत-अमेरिका व्यापार समझौता दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों में सुधार लाएगा। हालांकि इसके पूरी जानकारी आनी बाकी है। जिन सेक्टर को सबसे अधिक फायदा होने की उम्मीद है, उनमें टेक्सटाल और वस्त्र जेम्स और ज्वेलरी, इंजीनियरिंग सामान, केमिकल्स, लेदर और फुटवियर शामिल हैं। यह समझौता निर्यात पर आधारित एग्रीकल्चर और मैन्युफैक्चरिंग सेगमेंट के लिए अर्निंग्स विजबिलिटी भी बढ़ा सकता है। साथ ही आईटी सर्विसेज और फार्मास्यूटिकल्स में शॉर्ट-टर्म रिकवरी में भी मदद कर सकता है। हालांकि, ऑटोमोबाइल, स्टील और एल्युमीनियम जैसे सेक्टर्स पर सेक्शन 232 के तहत लगाए गए टैरिफ में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
टेक्सटाइल और परिधान
रिपोर्ट के अनुसार टेक्सटाइल और परिधान सेक्टर की यूएस बाजार पर निर्भरता अधिक है, जिसमें होम टेक्सटाइल, मेड-अप्स और कपड़ों में कम टैरिफ से बांग्लादेश, वियतनाम और चीन के निर्यातकों के मुकाबले भारत की लैंडेड-प्राइस कॉम्पिटिटिवनेस बेहतर होती है। इससे ऑर्डर अधिक मिलेंगे, पूरी क्षमता का इस्तेमाल और मार्जिन बढ़ने की उम्मीद है। यह सेक्टर लेबर इंसेंटिव है, इसके कम मार्जिन को देखते हुए, मामूली टैरिफ कटौती भी अमेरकी रिटेलर्स के सोर्सिंग के फैसलों पर काफी असर डाल सकती है।
ऑटो एंसिलरीज
भारतीय ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर यूएस ओईएम और टियर -1 सप्लायर्स को फोर्जिंग, कास्टिंग, एक्सल, टायर वगैरह प्रिसिजन कंपोनेंट एक्सपोर्ट करते हैं। कम टैरिफ से मेक्सिको और चीन के सप्लायर्स के मुकाबले मूल्य प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, जिससे भारत से सोर्सिंग बढ़ सकती है।
फार्मास्यूटिकल्स
यह समझौता फार्मास्यूटिकल सेक्टर के लिए पॉजिटिव है, क्योंकि यूएस भारतीय जेनेरिक और APIs के लिए सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है। कम टैरिफ से चीन और दूसरे सप्लायर्स के मुकाबले मूल्य प्रतिस्पर्धा बेहतर होती है, बहुत ज्यादा प्राइस-सेंसिटिव मार्केट में मार्जिन को सपोर्ट मिलता है, और चल रहे आपूर्ती शृंखला डाइवर्सिफिकेशन के बीच भारत से सोर्सिंग को बढ़ावा मिलता है।
केमिकल्स
यूएस में बाजार में अधिक मांग वाले विशेष केमिकल्स, एग्रोकेमिकल्स और फ्लोरोकेमिकल्स के निर्यातकों को बेहतर ट्रेड इकोनॉमिक्स और चीन से दूर लगातार डाइवर्सिफिकेशन से फायदा होगा। टैरिफ में राहत से बेहतर मूल्य, अधिक वॉल्यूम और मजबूत कस्टमर रिलेशन मिल सकते हैं।