ऑटो सेक्टर पर मंदी की मार (ग्राफिक्स-रोहित झा)
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286 शोरूम बंद
स्थिति यह है कि इस साल अप्रैल तक पिछले 18 माह की अवधि में देश के 271 शहरों में गाड़ियों के 286 शोरूम बंद हो चुके हैं जिसमें 32,000 लोगों की नौकरी गई थी।ऑटो सेक्टर में दो लाख नौकरियों की यह कटौती इसके अतिरिक्त है। इस तरह पिछले डेढ़ साल में करीब 3.5 लाख नौकरियां जा चुकी हैं। चिंता की बात यह है कि अच्छे चुनावी परिणाम और बजट के बावजूद वाहन क्षेत्र की सुस्ती दूर नहीं हो पाई है। इस वजह से और शोरूम बंद होने का संकट बना हुआ है।
फिलहाल ज्यादातर छंटनियां फ्रंट और बिक्री केंद्रों में हो रही हैं लेकिन सुस्ती का यह रुख यदि जारी रहता है तो तकनीकी नौकरियां भी प्रभावित होंगी। यह तो महज बानगी है। देश के अन्य उद्योगों की भी कमोबेश यही स्थिति है।
आईआईपी के आंकड़े
समग्र औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) के आंकड़े संकट की कहानी को साफ बयां कर रहे हैं। जून में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर दो फीसद पर सिमट गई। इस दौरान पिछले साल इस अवधि में यह आंकड़ा सात फीसद के स्तर पर था। इस साल खनन और विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है। ये दोनों क्षेत्र रोजगार के प्रमुख केंद्र हैं। इससे साफ जाहिर होता आर्थिक मोच्रे पर समस्याएं कोई मामूली नहीं हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में गिरी गिरावट
दरअसल, समस्या की मूल वजह ग्रामीण क्षेत्र की मांग में कमी है। बार-बार बंटवारा होने से खेती लाभकारी नहीं रह गई है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों में लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास करना चाहिए। यदि ग्रामीणों की आय बढ़ती है तो इससे एक साथ कई समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है।
यह नहीं हो सकते हैं समाधान
कर्ज माफी, सब्सिडी और नकद सहायता किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकते। यदि ग्रामीणों को सिर्फ वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा तो आने वाले दिनों में इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ऐसे में समय की दरकार है कि सरकार को आर्थिक मोर्चे पर अपनी रणनीति में बदलाव करना चाहिए। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।
जीएसटी में किए थे बदलाव
जीएसटी के मामले में सरकार की जितनी तारीफ की जाए वह कम है। उद्योग एवं आम जन की समस्या को देखते हुए इस पण्राली में कई बार बदलाव किए जा चुके हैं। यही वजह है कि व्यापारी वर्ग अब जीएसटी का दिल से समर्थन कर रहा है। सरकार जब इस मोर्चे पर अपना रुख बदल सकती है तो फिर बजट से जुड़े कुछ प्रावधानों को लेकर इतनी सख्त क्यों है, यह समझ से परे है।
लगाना होगा मरहम
डा. रवि सिंह ने बताया कि वित्तीय क्षेत्र और वाहन उद्योग की समस्या अब जग जाहिर हैं। इस बात को सरकार भी स्वीकार कर चुकी है लेकिन इनके जख्मों पर मरहम लगाने का कोई काम नहीं किया गया है। अर्थशास्त्र का देसी फार्मूला है कि जब विकास दर में एक फीसद की वृद्धि हासिल होती है तो बाजार में एक करोड़ नए रोजगार सृजित होते हैं।
पिछले पांच साल के कार्यकाल में मोदी सरकार ने रिकार्ड आर्थिक वृद्धि हासिल करने का दावा किया है। ऐसे में सवाल यह है कि जब तेज गति से विकास हो रहा है तो फिर नए रोजगार पैदा क्यों नहीं हो रहे? देश में बेरोजगारों की फौज क्यों बढ़ती जा रही है? हकीकत यह है कि रोजगार के मुद्दे पर यह सरकार सबसे ज्यादा बेबस नजर आई है।
बेरोजगारी को कम करना होगा
पिछले दिनों जारी सरकारी आंकड़ों में देश में बेरोजगारी की दर पिछले चार दशक के ज्यादा की अवधि में सबसे ऊंची दर्ज हुई है। आने वाले दिनों में यह समस्या और भयावह होती दिख रही है।
उद्योग जगत में सुस्ती
उद्योग जगत में सुस्त मांग की वजह से चारों ओर छंटनी का दौर चल रहा है। वाहन उद्योग में यह संकट खतरे की घंटी की ओर इशारा कर रहा है। इस उद्योग में कुल मिलाकर एक करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। वाहनों की मांग में कमी की वजह से तमाम कंपनियां अब अपने उत्पादन में कटौती कर रह रही हैं। जाहिर तौर पर वाहन उद्योग में बड़े पैमाने पर छंटनी की जा रही है। वाहनों की बिक्री में भारी गिरावट के बीच देशभर में वाहन डीलर बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छंटनी कर रहे हैं।
उद्योग संगठन फेडरेशन ऑफ आटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (फाडा) की रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन माह के दौरान खुदरा विक्रेताओं ने करीब दो लाख कर्मचारियों को नौकरी से बाहर निकाला। निकट भविष्य में स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं दिख रही है।