वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, पश्चिम एशिया संकट और बाजार में जारी अस्थिरता का असर भले ही वैश्विक व्यापारिक मोर्चे पर दिख रहा हो, लेकिन भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को सहने के लिए मजबूती से तैयार है। देश का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) और फिनटेक सेक्टर इन भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच एक मजबूत लचीला आधार दे रहा है।
जवाब: पश्चिम एशिया का तनाव हो, जलवायु परिवर्तन (जैसे एल नीनो) या फिर कोविड जैसी महामारी, अब ये भू-राजनीतिक और वैश्विक चुनौतियां एक सामान्य बात हो गई हैं। इन संकटों के कारण वैश्विक पूंजी बाजार प्रभावित होता है, जिससे बाजार में पूंजी की लागत बढ़ जाती है। इससे निपटने के लिए भारतीय कंपनियां टेक्नोलॉजी का प्रभावी इस्तेमाल करके अपनी परिचालन लागत कम कर रही हैं। जब परिचालन लागत नियंत्रित रहती है, तो बाहरी वित्तीय दबावों के बावजूद व्यवसायों को सुचारू रूप से चलाया जा सकता है और ग्राहकों को किफायती कीमत पर सेवाएं दी जा सकती हैं।
जवाब: भारत की डीपीआई पहल ने वित्तीय सेवाओं को भौगोलिक बाधाओं से निकालकर देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा दिया है। पीआईबी की रिपोर्ट के अनुसार, 29 अप्रैल 2026 तक जन-धन खातों की संख्या 2015 के 14.72 करोड़ से उछलकर 58.16 करोड़ हो गई है, जिनमें कुल 3.02 लाख करोड़ रुपये जमा हैं। प्रमाणीकरण के लिए मार्च 2026 तक 144 करोड़ से अधिक आधार नंबर बनाए जा चुके हैं।
डिजिटल भुगतान की बात करें तो यूपीआई (यूपीआई) ने अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है; सिर्फ मार्च 2026 में यूपीआई पर 29.53 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 2,264.11 करोड़ लेनदेन हुए, जो भारत के कुल खुदरा भुगतान का लगभग 81 प्रतिशत है। इसके अलावा, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के जरिए जनवरी 2026 तक 49.09 लाख करोड़ रुपये सीधे लाभार्थियों के खाते में भेजे गए हैं, जिससे बिचौलियों और फर्जी लाभार्थियों को हटाकर सरकारी खजाने में 4.31 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई है।
जवाब: पारंपरिक क्रेडिट स्कोरिंग में एमएसएमई और अनौपचारिक श्रमिकों को अक्सर कर्ज मिलने में दिक्कत आती थी, लेकिन एआई (एआई) और वैकल्पिक डेटा (जैसे डिजिटल भुगतान, जीएसटी फाइलिंग आदि) ने इस तस्वीर को बदल दिया है।
सरकारी आकलन के मुताबिक, एआई-संचालित क्रेडिट मॉडल में 130-170 बिलियन डॉलर के ऋण अंतर (क्रेडिट गैप) को पाटने की क्षमता है, जिससे छोटे व्यवसायों की अनौपचारिक कर्ज पर निर्भरता कम होगी। इसमें यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस (यूएलआई) और अकाउंट एग्रीगेटर (एए) अहम भूमिका निभा रहे हैं।
12 दिसंबर 2025 तक यूएलआई प्लेटफॉर्म पर 64 ऋणदाताओं (41 बैंक और 23 एनबीएफसी) को शामिल किया जा चुका है। वहीं, 31 दिसंबर 2025 तक 252.9 मिलियन (करीब 25.29 करोड़) उपयोगकर्ताओं ने अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क पर अपने खाते लिंक किए हैं, जो 2.6 बिलियन से अधिक खातों के साथ सुरक्षित रूप से डेटा साझा करने में सक्षम बना रहा है।
जवाब: कोरोना महामारी के बाद से ग्रामीण और छोटे शहरों में डिजिटल सेवाओं को अपनाने के प्रति डर लगभग खत्म हो गया है। जानकारों के अनुसार, फिनटेक प्लेटफॉर्म्स पर अब लगभग 45 प्रतिशत यूजर्स टियर-3 और 4 शहरों से आ रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि वित्तीय समावेशन का दायरा महानगरों से निकलकर देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच गया है। भारत और इंडिया के बीच की यह कम होती खाई स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है, जिससे वैश्विक संकटों का असर सीमित हो जाता है।
जवाब: वित्तीय क्षेत्र में व्यवसाय अपनी क्षमता बढ़ाने और खर्च घटाने के लिए एआई का बेहतरीन इस्तेमाल कर रहे हैं। जो लोन अप्रूवल और केवाईसी प्रक्रियाएं पहले ब्रांच में जाने पर कई दिन का समय लेती थीं, वे अब एआई के जरिए महज चार मिनट में पूरी हो रही हैं। इसके अलावा, एआई का उपयोग साइबर सिक्योरिटी को चाक-चौबंद करने, मार्केटिंग कैंपेन में तेजी लाने और कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।
गेट्स फाउंडेशन के अनुसार डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) डिजिटल भुगतान, पहचान पत्र और डेटा साझेदारी के मोर्चे पर सार्वजनिक लाभ के लिए डिजाइइन किए गए हैं। डीपीआई पूरी अर्थव्यवस्था में फैला हुआ है। यह लोगों, डेटा और वित्तीय पहुंच को ठीक उसी तरह जोड़ता है जैसे सड़कें और रेलगाड़ियां लोगों और वस्तुओं को जोड़ती हैं।
एआई, डीपीआई और फिनटेक के तर्कसंगत प्रयोग से भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया संकट जैसे झटकों के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था अपने मजबूत डिजिटल ढांचे डीपीआई के दम पर डटकर खड़ी है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए यह तकनीकी एकीकरण और 140 करोड़ लोगों का पूर्ण वित्तीय समावेशन सबसे अहम माध्यम साबित हो रहा है।