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GTRI: जीटीआरआई ने अमेरिका से जीएम कृषि उत्पादों के आयात पर किया आगाह, भारत का कृषि निर्यात हो सकता है प्रभावित

Sat, 05 Jul 2025 12:36 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा कि पशु आहार के लिए सोयाबीन खली और घुलनशील आसुत सूखे अनाज (डीडीजीएस) जैसे जीएम उत्पादों के आयात की अनुमति देने से यूरोपीय संघ (ईयू) को भारत के कृषि निर्यात पर असर पड़ेगा। यह भारतीय निर्यातकों के लिए एक प्रमुख गंतव्य है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Freepik
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विस्तार
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भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते के तहत वहां से से आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) कृषि उत्पादों को अनुमति देने से भारत पर प्रभाव पड़ेगा। ऐसा होने से यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्रों में देश के कृषि निर्यात पर असर पड़ सकता है। आर्थिक थिंक टैंक जीटीआरआई ने शनिवार को इसे लेकर आगाह किया है। भारत और अमेरिका एक अंतरिम व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। इसकी आधिकारिक घोषणा 9 जुलाई से पहले होने की उम्मीद है।

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ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा कि पशु आहार के लिए सोयाबीन खली और घुलनशील आसुत सूखे अनाज (डीडीजीएस) जैसे जीएम उत्पादों के आयात की अनुमति देने से यूरोपीय संघ (ईयू) को भारत के कृषि निर्यात पर असर पड़ेगा। यह भारतीय निर्यातकों के लिए एक प्रमुख गंतव्य है। डीडीजीएस इथेनॉल उत्पादन के दौरान बनाया जाने वाला एक उप-उत्पाद है, जो आमतौर पर मक्का या अन्य अनाज से बनता है।

यूरोपीय संघ में जीएम लेबलिंग के नियम सख्त

यूरोपीय संघ में जीएम लेबलिंग के सख्त नियम हैं और जीएम से जुड़े उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं का कड़ा विरोध है। भले ही जीएम फ़ीड की अनुमति है, लेकिन कई यूरोपीय खरीदार पूरी तरह से जीएम-मुक्त आपूर्ति शृंखलाओं को प्राथमिकता देते हैं।

जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत में कृषि-लॉजिस्टिक्स का बिखराव और पृथक्करण संबंधी बुनियादी ढांचे की कमी के कारण क्रॉस-संदूषण की संभावना बनी हुई है, जिससे निर्यात खेपों में जीएम की मौजूदगी का खतरा है।

भारत की छवि को पहुंच सकता है नुकसान

उन्होंने कहा, "इससे शिपमेंट अस्वीकृत हो सकता है, परीक्षण लागत बढ़ सकती है। भारत की जीएमओ-मुक्त छवि को नुकसान पहुंच सकता है, खासकर चावल, चाय, शहद, मसाले और जैविक खाद्य पदार्थों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में। मजबूत ट्रेसेबिलिटी और लेबलिंग सिस्टम के बिना, जीएम फ़ीड आयात यूरोपीय संघ में भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को नुकसान पहुंचा सकता है।"

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आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें, पौधे के डीएनए में विशिष्ट जीनों को सम्मिलित करके बनाई जाती हैं, जो अक्सर बैक्टीरिया, वायरस, अन्य पौधों या कभी-कभी जानवरों से प्राप्त होते हैं, ताकि नए गुण, जैसे कीट प्रतिरोध या शाकनाशी सहिष्णुता, उत्पन्न किए जा सकें।

उदाहरण के लिए, बैसिलस थुरिंजिएंसिस नामक जीवाणु से प्राप्त बीटी जीन पौधे को कुछ कीटों के लिए विषैला प्रोटीन बनाने में सक्षम बनाता है। उन्होंने कहा कि मिट्टी के जीवाणुओं सहित अन्य जीनों का उपयोग फसलों को शाकनाशियों के प्रति प्रतिरोधी बनाने के लिए किया गया है।

उन्होंने कहा कि हालांकि जीएम फसलें जैविक रूप से पौधों पर आधारित हैं और शाकाहारी भोजन के रूप में कार्य करती हैं, लेकिन तथ्य यह है कि उनमें से कुछ में पशु मूल के जीन होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे उन समुदायों या व्यक्तियों को स्वीकार्य नहीं हो सकते हैं जो शाकाहार की धार्मिक या नैतिक परिभाषाओं का कड़ाई से पालन करते हैं। श्रीवास्तव ने आगे कहा कि शोध से पता चलता है कि जीएम डीएनए पाचन के दौरान टूट जाता है और पशु के मांस, दूध या उत्पाद में प्रवेश नहीं करता है।

उन्होंने कहा, "इसलिए, दूध या चिकन जैसे खाद्य पदार्थों को जीएम के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाता है, भले ही जानवरों को जीएम फ़ीड खिलाया गया हो। हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि इससे उन उपभोक्ताओं के लिए सीमा धुंधली हो जाती है जो जीएम-संबंधित उत्पादों से पूरी तरह बचना चाहते हैं।"

यह पूछे जाने पर कि क्या आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों से प्राप्त बीजों का भविष्य में बुवाई के लिए पुनः उपयोग किया जा सकता है, उन्होंने कहा कि कानूनी और जैविक कारणों से जीएम बीज आमतौर पर पुनः उपयोग योग्य नहीं होते हैं।

भारत में बीटी कॉटन एकमात्र स्वीकृत जीएम फसल

उन्होंने कहा, "इनका पेटेंट कराया जाता है और इन्हें ऐसे अनुबंधों के तहत बेचा जाता है, जो इन्हें बचाने और दोबारा लगाने पर रोक लगाते हैं। दोबारा इस्तेमाल किए जाने पर भी कई जीएम फसलें संकर होती हैं और उनके सहेजे गए बीज अक्सर खराब प्रदर्शन करते हैं। भारत में बीटी कॉटन एकमात्र स्वीकृत जीएम फसल है और जब किसानों ने इसके बीजों का दोबारा इस्तेमाल करने की कोशिश की, तो नतीजे घटिया रहे।" इसके अलावा, उन्होंने कहा कि संदूषण का खतरा दुनिया भर में चिंता का विषय बना हुआ है। श्रीवास्तव ने कहा कि जीएम और गैर-जीएम फसलें आपूर्ति शृंखला के विभिन्न बिंदुओं पर, विशेषकर परिवहन, भंडारण या प्रसंस्करण के दौरान, आपस में मिल सकती हैं।

उन्होंने कहा कि भारत में वर्तमान नीति अपेक्षाकृत रूढ़िवादी है और केवल एक जीएम फसल -बीटी कपास- की खेती को मंजूरी दी गई है। जीटीआरआई ने कहा, "किसी भी जीएम खाद्य फसल की व्यावसायिक खेती नहीं की जाती है, हालांकि प्रायोगिक परीक्षण जारी हैं। जीएम सोयाबीन तेल और कैनोला तेल के आयात की अनुमति है।" उन्होंने कहा कि जीएम अनाज, दालों, तिलहन, फलों और इसी तरह के खाद्य/चारा उत्पादों के आयात की अनुमति नहीं है। सोयाबीन भोजन और डीडीजीएस जैसी जीएम फ़ीड सामग्री पर वर्तमान में प्रतिबंध है।

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