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जीएसटी नियमों में बदलाव की सिफारिश: मुकदमे की सीमा बढ़ेगी, छोटे कारोबारियों को राहत; जानें सीआईआई ने क्या कहा

Sun, 01 Nov 2026 06:23 PM IST
शिवम गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

जीएसटी परिषद के कुछ अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और सजा संबंधी नियमों में बदलाव की सिफारिश को CII ने महत्वपूर्ण सुधार बताया है। इससे कारोबारियों को क्या राहत मिलेगी और कर प्रशासन में क्या बदलाव आएगा? आइए, जानते हैं...
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जीएसटी काउंसिल मीटिंग। - फोटो : amarujala.com
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विस्तार
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उद्योग संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने जीएसटी परिषद के कुछ अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और प्रवर्तन शक्तियों को तर्कसंगत बनाने के फैसले को महत्वपूर्ण संस्थागत सुधार बताया है। संगठन के मुताबिक, यह कदम भरोसे पर आधारित आर्थिक शासन की ओर बदलाव का संकेत है। साथ ही भारत में आर्थिक सुधारों के अगले चरण के लिए एक मॉडल भी पेश करता है।

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जीएसटी परिषद की आठ अक्तूबर को हुई बैठक में लिए गए फैसलों पर सीआईआई ने कहा कि आम सहमति से लिए गए ये निर्णय दिखाते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें कठिन सुधारों के लिए मिलकर काम कर सकती हैं। इससे सरकार और कारोबारियों के बीच संबंध बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

पीएम मोदी और वित्त मंत्री के नेतृत्व की सराहना
सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा कि जीएसटी परिषद के फैसले ऐतिहासिक संस्थागत सुधार हैं। उन्होंने इस बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व की सराहना की। साथ ही इस मुद्दे पर सहमति बनाने में राज्य सरकारों की रचनात्मक भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया।
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बनर्जी ने कहा कि प्रवर्तन, राजस्व की सुरक्षा और करदाताओं के अधिकारों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बुनियादी बदलावों को लेकर सहमति बनाना सहकारी संघवाद की बड़ी उपलब्धि है। यह दिखाता है कि केंद्र और राज्य सरकारें वैध कारोबार को अधिक भरोसा देने के लिए पुराने नियामक तरीकों पर दोबारा विचार करने को तैयार हैं।

गिरफ्तारी और जेल की सजा से जुड़े प्रावधानों में बदलाव की सिफारिश
जीएसटी परिषद ने आठ अक्तूबर को हुई अपनी 57वीं बैठक में जीएसटी कानून के तहत गिरफ्तारी के प्रावधान हटाने की सिफारिश की थी। इसके अलावा, मुकदमा चलाने की सीमा एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये करने और केंद्रीय जीएसटी अधिनियम (CGST Act) की धारा 132 के तहत कुछ अपराधों का दायरा सीमित करने का प्रस्ताव दिया गया।

परिषद ने जेल की सजा से जुड़े प्रावधानों को भी तर्कसंगत बनाने की सिफारिश की। इसके तहत अदालतों को सजा तय करने में अधिक अधिकार देने, केवल जुर्माना लगाने का विकल्प उपलब्ध कराने और न्यूनतम छह महीने की जेल की सजा का प्रावधान हटाने की बात कही गई। प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य वास्तविक कारोबारी विवादों और प्रक्रियागत गलतियों को जानबूझकर की गई कर धोखाधड़ी और कर चोरी से अलग करना है। इन सिफारिशों को लागू करने के लिए जरूरी विधायी संशोधन करने होंगे।

MSME और पहली पीढ़ी के उद्यमियों को होगा फायदा
सीआईआई ने कहा कि इन बदलावों से छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) तथा पहली पीढ़ी के उद्यमियों को विशेष फायदा होगा। इससे अनिश्चितता, प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने के जोखिम, कानूनी खर्च और आपराधिक कार्रवाई के अनुपातहीन परिणामों के कारण कारोबार के प्रबंधन में आने वाली बाधाओं को कम करने में मदद मिलेगी।

बनर्जी ने कहा कि इस सुधार का महत्व सिर्फ इतना नहीं है कि प्रवर्तन की कुछ शक्तियां हटाई जा रही हैं। बल्कि जीएसटी परिषद ने यह माना है कि प्रभावी कर प्रशासन के लिए आपराधिक कार्रवाई की धमकी पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि जीएसटी का दायरा अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र तक फैला हुआ है। ऐसे में भरोसे पर आधारित शासन की दिशा में यह हाल के वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है।

कर प्रशासन में तकनीक और बेहतर जानकारी की भूमिका
बनर्जी के अनुसार, यह फैसला वैध कारोबार में भरोसा दिखाता है। साथ ही यह भी बताता है कि आधुनिक कर प्रशासन बेहतर जानकारी, तकनीक और लक्षित कार्रवाई के जरिए राजस्व की सुरक्षा कर सकता है। उन्होंने कहा कि उद्योग जगत को नियामक सोच में आए इस बदलाव के महत्व को समझना चाहिए। सीआईआई ने यह भी बताया कि केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) की ओर से 26 अक्तूबर को जारी सर्कुलर में पंजीकरण, नोटिस और फैसले से जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं पर ध्यान दिया गया है। इनमें धोखाधड़ी के आरोपों को सबूतों के आधार पर साबित करने, कर नोटिस में अधिक स्पष्टता रखने और तर्कपूर्ण फैसले सुनिश्चित करने की जरूरत शामिल है।

संगठन के मुताबिक, इन उपायों के साथ जीएसटी परिषद के तेजी से रिफंड, इनपुट टैक्स क्रेडिट और अनुपालन प्रक्रिया को आसान बनाने से जुड़े फैसले भी मददगार हो सकते हैं। इससे कार्यशील पूंजी का बेहतर इस्तेमाल होगा, अनावश्यक विवाद कम होंगे और कर प्रशासन अधिक अनुमानित बनेगा। हालांकि, इनका पूरा असर अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार एक समान तरीके से लागू किए जाने पर निर्भर करेगा।

ईमानदार करदाताओं के लिए नियमों का पालन करना हो आसान
बनर्जी ने कहा कि भरोसे पर आधारित शासन का मतलब प्रवर्तन को कमजोर करना नहीं है, बल्कि उसे अधिक सटीक, निष्पक्ष और प्रभावी बनाना है। उन्होंने कहा कि जीएसटी लागू होने के करीब एक दशक बाद भारत के डिजिटल टैक्स इंफ्रास्ट्रक्चर, ई-इनवॉइसिंग, इलेक्ट्रॉनिक रिटर्न और डेटा एनालिटिक्स की मदद से जानबूझकर की जाने वाली कर चोरी की पहचान करने और उचित कार्रवाई करने की क्षमता काफी बढ़ी है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक कर व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें ईमानदार करदाताओं के लिए नियमों का पालन करना आसान हो और जानबूझकर कानून तोड़ने वालों के लिए कर चोरी करना मुश्किल हो।

अगले आर्थिक सुधारों के लिए भी मॉडल बन सकता है फैसला
सीआईआई ने कहा कि जीएसटी परिषद का यह तरीका आर्थिक सुधारों के अगले चरण के लिए भी मॉडल बन सकता है। इसके लिए केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत होगी। संगठन के मुताबिक, भूमि उपयोग, निर्माण की अनुमति, श्रम प्रशासन, बिजली-पानी जैसी सुविधाओं के कनेक्शन, लॉजिस्टिक्स और स्थानीय नियामक मंजूरियों जैसे क्षेत्रों में भी बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।

बनर्जी ने कहा कि भारत में आर्थिक बदलाव का अगला चरण तेजी से सहकारी संघवाद पर निर्भर करेगा। निवेश, विनिर्माण और कारोबार के विस्तार में आने वाली कई बाधाएं केंद्र, राज्य और स्थानीय नियमों के बीच तालमेल की कमी से जुड़ी हैं। उन्होंने भूमि, श्रम, निर्माण, बुनियादी सुविधाओं और स्थानीय मंजूरियों से जुड़े क्षेत्रों में भी इसी तरह के समन्वय और सुधार की प्रतिबद्धता पर जोर दिया, ताकि कारोबार करना आसान हो और उसकी लागत व समय कम हो सके।

सीआईआई ने कहा कि भरोसे पर आधारित कर प्रशासन की दिशा में बदलाव के साथ उद्योग जगत की जिम्मेदारी भी बढ़ती है। कारोबारियों को स्वैच्छिक अनुपालन, आंतरिक नियंत्रण, दस्तावेजीकरण और जिम्मेदार कर व्यवहार को मजबूत करना चाहिए। बनर्जी ने कहा कि उद्योग जगत को जिम्मेदार व्यवहार और नियमों का बेहतर स्वैच्छिक पालन करके इन सुधारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

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