अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का सुदूर दक्षिणी छोर इन दिनों देश की राजनीति और भू-रणनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कैंपबेल बे का दौरा करने के बाद केंद्र सरकार के 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' को 'विकास के नाम पर विनाश' और 'देश की प्राकृतिक तथा आदिवासी विरासत के खिलाफ सबसे बड़ा घोटाला' करार दिया है। एक तरफ विपक्ष और पर्यावरणविद् इसे प्रकृति और आदिवासियों के लिए मौत का फरमान मान रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकार इसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में एक 'अपरिहार्य सामरिक जरूरत' बता रही है।
सवाल: राहुल गांधी और विपक्ष इस प्रोजेक्ट का इतना विरोध क्यों कर रहे हैं?
जवाब: विपक्ष और पर्यावरणविदों के विरोध का मुख्य कारण इससे होने वाला भारी प्राकृतिक नुकसान है। राहुल गांधी का आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 160 वर्ग किलोमीटर के घने जंगल काटे जाएंगे, जिससे लाखों पेड़ खत्म हो जाएंगे और स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों का हनन होगा।
पर्यावरणविदों के अनुसार, यहां करीब 8.5 लाख से 10 लाख पेड़ (कुछ दावों के अनुसार 58 लाख तक) काटे जाने का अनुमान है। इसके अलावा, जिस गैलाथिया बे में बंदरगाह बन रहा है, वह विलुप्तप्राय 'विशाल लेदरबैक समुद्री कछुओं' के घोंसले बनाने का दुनिया का सबसे अहम ठिकाना है। निर्माण कार्यों के शोर और रोशनी से इनका जीवन और प्रजनन बुरी तरह प्रभावित होगा।
सवाल: अगर इतना नुकसान है, तो सरकार के लिए यह प्रोजेक्ट इतना अहम क्यों है?
जवाब: सरकार के लिए यह प्रोजेक्ट देश की 'आर्थिक आत्मनिर्भरता'और 'सामरिक सुरक्षा' का ब्रह्मास्त्र है।
सवाल: जंगल कटने से जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई कैसे की जाएगी?
जवाब: कानून के मुताबिक, जहां वन काटे जाते हैं, उसके बदले सरकार को 'प्रतिपूरक वनीकरण' (Compensatory Afforestation) करना होता है। चूंकि अंडमान-निकोबार में पहले से ही 75% से अधिक जंगल हैं, इसलिए वहां नए जंगल लगाना संभव नहीं है।
इसके समाधान के लिए सरकार ने एक अनोखा (और पर्यावरणविदों की नजर में विवादित) फैसला लिया है। निकोबार के जंगलों की कटाई की भरपाई हरियाणा के अरावली क्षेत्र (97.30 वर्ग किमी) में पेड़ लगाकर की जाएगी। सरकार का यह भी कहना है कि 166 वर्ग किमी प्रोजेक्ट एरिया में से करीब 65.99 वर्ग किमी हिस्से को 'ग्रीन जोन' के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा।
सवाल: वहां रहने वाले आदिवासियों (शोम्पेन और निकोबारी) का क्या होगा?
जवाब: यह सबसे संवेदनशील मानवीय संकट है। यहां बाहरी दुनिया से कटे रहने वाले 'शोम्पेन' (आबादी 237-250) और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले 'निकोबारी' (आबादी 1,094-1,200) आदिवासी रहते हैं। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि जब द्वीप की आबादी 8,000 से बढ़कर 3.5 लाख से अधिक हो जाएगी, तो "जनसांख्यिकीय विस्फोट" होगा। बाहरी लोगों के संपर्क में आने से शोम्पेन जनजाति को फ्लू जैसी विदेशी बीमारियों का खतरा है, जिससे लड़ने की उनकी शारीरिक क्षमता (इम्युनिटी) नहीं है।
हालांकि, सरकार का स्पष्ट आश्वासन है कि किसी भी आदिवासी को उनके घर (जैसे राजीव नगर और न्यू चिंगेन) से विस्थापित नहीं किया जाएगा। सरकार का दावा है कि प्रोजेक्ट में ली जा रही आदिवासी जमीन के बदले 76.98 वर्ग किमी नई जमीन को ट्राइबल रिजर्व घोषित किया जा रहा है, जिससे आदिवासी इलाके में कुल 3.91 वर्ग किमी की वृद्धि होगी।
सवाल: क्या इस क्षेत्र में भूकंप और सुनामी का भी कोई खतरा है?
जवाब: हां, भूवैज्ञानिक इस खतरे को लेकर बहुत चिंतित हैं। यह क्षेत्र 'अंडमान-सुमात्रा सबडक्शन जोन' पर स्थित है और सबसे खतरनाक भूकंपीय 'जोन पांच' में आता है। साल 2004 में आई भयानक सुनामी में इसी द्वीप का दक्षिणी हिस्सा 15 फीट तक नीचे धंस गया था। देश के शीर्ष भूवैज्ञानिकों का कहना है कि इतने सक्रिय फॉल्टलाइन के ऊपर बिना विशेष अध्ययन के 81,000 करोड़ का निवेश एक 'टाइम बम' जैसा है। वहीं, मंत्रालय के अधिकारियों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में लिया गया एक कैलकुलेटेड रिस्कबताया है।
सवाल: क्या इस प्रोजेक्ट को कानूनी मंजूरी मिल चुकी है?
जवाब: जी हां। पर्यावरणविदों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में इस प्रोजेक्ट और इसकी क्लियरेंस को चुनौती दी थी। लेकिन फरवरी 2026 में एनजीटी की विशेष पीठ ने सरकार की पर्यावरण मंजूरी को बरकरार रखा। ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास को पर्यावरण के साथ संतुलित करना आवश्यक है, और सरकार ने प्रकृति व आदिवासियों की रक्षा के लिए पर्याप्त शर्तें लागू की हैं।
सवाल: क्या 81,000 करोड़ रुपये का यह भारी-भरकम निवेश आर्थिक रूप से व्यावहारिक है?
जवाब: अर्थशास्त्रियों और आलोचकों ने इस प्रोजेक्ट की लागत और भविष्य के मुनाफे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जब 2020 में इस परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई थी, तब इसकी अनुमानित लागत केवल 8,000 करोड़ रुपये (लगभग 1 बिलियन डॉलर) थी। लेकिन अब यह लागत नाटकीय रूप से बढ़कर 72,000 से 81,800 करोड़ रुपये के बीच पहुंच गई है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि मुख्य भूमि से बहुत दूर होने के कारण यहां निर्माण सामग्री (रेत, सीमेंट, मशीनरी) ले जाने की लॉजिस्टिक्स लागत तीन गुना अधिक होगी। इसके अलावा, वैश्विक जहाजों को सिंगापुर या कोलंबो से खींचने के लिए भारत इस नए बंदरगाह पर अधिक 'हैंडलिंग शुल्क' नहीं वसूल सकता। ऐसे में, शुरुआती वर्षों में इस ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल के भारी घाटे में चलने की आशंका है, जिसका सीधा वित्तीय बोझ भारतीय करदाताओं पर पड़ सकता है।
सवाल: चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति और म्यांमार के 'कोको द्वीप' से इस प्रोजेक्ट का क्या कनेक्शन है?
जवाब: भारत की इस आक्रामक सामरिक नीति के पीछे चीन की बढ़ती घेराबंदी मुख्य कारण है। चीन लंबे समय से भारत को घेरने के लिए 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत वह श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में बंदरगाह बना रहा है।
भारत के लिए सबसे तत्काल खतरा म्यांमार का 'ग्रेट कोको द्वीप' है, जो भारत के उत्तरी लैंडफॉल द्वीप से मात्र 35 किमी दूर है। सैटेलाइट इमेजरी से यह खुलासा हुआ है कि चीन की मदद से म्यांमार ने वहां अपना सैन्यीकरण तेज कर दिया है, रनवे को 2,300 मीटर तक बढ़ा लिया है और नए रडार स्टेशन स्थापित कर लिए हैं। इससे चीन बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना पर आसानी से नजर रख सकता है। इसी खतरे को बेअसर करने के लिए ग्रेट निकोबार को भारत के 'रिवर्स पर्ल' के रूप में विकसित किया जा रहा है, ताकि अंडमान सागर और 'मलक्का जलडमरूमध्य' के पास भारतीय नौसेना की मजबूत उपस्थिति दर्ज की जा सके।
सवाल: क्या प्रोजेक्ट के लिए आदिवासियों से कानूनी सहमति ली गई है और इसे लेकर क्या विवाद है?
जवाब: यह कानूनी तौर पर इस प्रोजेक्ट का सबसे उलझा हुआ पहलू है। 'वन अधिकार अधिनियम, 2006' (एफआरए) के तहत किसी भी आदिवासी भूमि को विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल करने से पहले स्थानीय समुदायों की 'स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति' (एफपीआईसी) लेना अनिवार्य है।
सरकार का पक्ष है कि 73.07 वर्ग किमी आदिवासी रिजर्व भूमि लेने के बदले में 76.98 वर्ग किमी अतिरिक्त भूमि को नए रिजर्व के रूप में अधिसूचित किया गया है, और किसी भी वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ है। हालांकि, निकोबारी समुदाय की जनजातीय परिषद के अध्यक्ष का आरोप है कि उनसे दबाव में अनापत्ति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करवाए गए थे, जिसे वास्तुकला और भूमि विस्तार की हकीकत जानने के बाद उन्होंने आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया। निकोबारी समुदाय का दर्द यह है कि 2004 की सुनामी के बाद वे जिन पैतृक तटीय जमीनों को छोड़कर आए थे, वे अब हमेशा के लिए इस परियोजना में अधिग्रहित हो जाएंगी।