भारत सरकार ने अपने करीब 37 साल पुराने डिजिटल संचार आयोग (डिसीसी) को भंग कर दिया है। यह दूरसंचार विभाग का एक शीर्ष अंतर-विभागीय निर्णय लेने वाला निकाय था। यह निकाय देश में दूरसंचार से जुड़े नीतिगत मामलों और महत्वपूर्ण वित्तीय निहितार्थों वाले विषयों पर निर्णय लेता था। सरकार ने 19 सितंबर को एक अधिसूचना जारी कर इसकी जानकारी दी है। इस कदम से दूरसंचार क्षेत्र में नीतिगत निर्णय लेने की प्रक्रिया में बदलाव आने की उम्मीद है।
यह आयोग एक शीर्ष निर्णय लेने वाला निकाय था। इसमें नीति आयोग, वित्त मंत्रालय और औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग सहित अन्य विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। आयोग विवादास्पद मुद्दों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। अधिकांश दूरसंचार मामलों पर कैबिनेट को अंतिम स्वीकृति के लिए भेजने से पहले यह आयोग ही निर्णय लेता था। इसने स्पेक्ट्रम मूल्य निर्धारण और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की सिफारिशों जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय लेने में सहायता की थी। इसका मुख्य कार्य दूरसंचार क्षेत्र के लिए एक सुदृढ़ नीतिगत ढांचा तैयार करना और उसे लागू करवाना था।
इस निकाय की अंतिम बैठक 3 सितंबर को आयोजित की गई थी। इस बैठक में सैटकॉम स्पेक्ट्रम के आवंटन से संबंधित निर्णय को अंतिम रूप दिया गया था। एलोन मस्क के नेतृत्व वाली स्टारलिंक, भारती समूह समर्थित यूटेलसैट वनवेब और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस को भारत में सैटकॉम सेवाएं शुरू करने की अनुमति मिली है। यह निर्णय भारत में उपग्रह संचार सेवाओं के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोग ने इन कंपनियों को भारत में अपनी सेवाएं शुरू करने की प्रारंभिक अनुमति प्रदान की थी।
हालांकि, इन सैटकॉम सेवाओं को स्पेक्ट्रम आवंटन के बिना शुरू नहीं किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, सुरक्षा एजेंसियों से दूसरे चरण की सुरक्षा मंजूरी भी आवश्यक है। डिजिटल संचार आयोग ने दूरसंचार नियामक ट्राई द्वारा दिए गए अधिकांश सुझावों को पहले ही मंजूरी दे दी थी। सैटकॉम स्पेक्ट्रम पर इसकी सिफारिश को अब केंद्रीय कैबिनेट द्वारा अंतिम रूप से अनुमोदित किया जाना है। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही ये कंपनियां अपनी सेवाएं शुरू कर पाएंगी। यह अंतिम अनुमोदन ही इन कंपनियों के लिए भारत में परिचालन का मार्ग प्रशस्त करेगा।