2025 की दूसरी तिमाही में सोने की मांग 3 प्रतिशत बढ़कर 1,249 टन हो गई। यह वृद्धि धातु की ऊंची कीमतों के बावजूद दर्ज की गई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने अपनी एक एक हालिया रिपोर्ट में यह बात कही है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि तेजी बदलते भू-राजनीतिक परिवेश और मूल्य गति ने मांग को बनाए रखा है, जिससे सोने में मजबूत निवेश प्रवाह ने तिमाही आधार पर मांग में वृद्धि को बढ़ावा दिया।
विश्व स्वर्ण परिषद (डब्ल्यूजीसी) ने गुरुवार को कहा कि भारत में सोने की मांग अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 10 प्रतिशत घटकर 134.9 टन रह गई, जो एक साल पहले इसी तिमाही में 149.7 टन थी। मूल्य के आधार पर बात करें तो सोने की मांग इस कैलेंडर वर्ष की दूसरी तिमाही के दौरान 30 प्रतिशत बढ़कर 1,21,800 करोड़ रुपये हो गई, जबकि 2024 की इसी अवधि में यह 93,850 करोड़ रुपये थी। इस बीच, सोने की कीमतें पहली बार 1,00,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गईं।
विश्व स्वर्ण परिषद के वरिष्ठ बाजार विश्लेषक लुईस स्ट्रीट ने कहा, "वैश्विक बाजारों ने इस वर्ष की शुरुआत में व्यापारिक तनाव, अप्रत्याशित अमेरिकी नीतिगत बदलावों और लगातार भू-राजनीतिक उथल-पुथल के कारण उतार-चढ़ाव का सामना किया है।"
स्ट्रीट ने आगे कहा, "वर्ष की पहली छमाही में डॉलर के संदर्भ में सोने में उल्लेखनीय 26% की वृद्धि दर्ज की गई, जिसने कई प्रमुख परिसंपत्ति वर्गों को पीछे छोड़ दिया। वर्ष की इतनी प्रभावशाली शुरुआत के साथ, यह संभव है कि 2025 की दूसरी छमाही में सोना अपेक्षाकृत सीमित दायरे में कारोबार कर सके।"
सोने की मांग बढ़ाने में गोल्ड ईटीएफ ने एक प्रमुख मांग चालक के रूप में काम किया। इसमें तिमाही के दौरान 170 टन का प्रवाह देखा गया। 2024 की दूसरी तिमाही में इसमें मामूली बिकवाली दिखी थी। गोल्ड ईटीएफ भी 2020 के बाद से अपने उच्चतम पहली छमाही के कुल योग पर पहुंच गया, पहली तिमाही में रिकॉर्ड प्रवाह के साथ, वैश्विक गोल्ड ईटीएफ की मांग 397 टन तक पहुंच गई।
डब्ल्यूजीसी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुल बार और सिक्का निवेश में साल-दर-साल 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो 307 टन पर पहुंच गया है। इसमें चीनी निवेशक 44 प्रतिशत की उल्लेखनीय साल-दर-साल वृद्धि के साथ 115 टन के साथ सबसे आगे हैं। भारतीय निवेशकों ने भी अपनी होल्डिंग्स को जोड़ना जारी रखा है, यह दूसरी तिमाही में कुल 46 टन हो गया है। इस बीच, आभूषणों की मांग में गिरावट जारी रही। इस मद में खपत की मात्रा में 14 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 2020 में कोविड महामारी के दौरान देखे गए निम्नतम स्तर के करीब पहुंच गई।