वैश्विक व्यापार का वह दौर अब खत्म हो चुका है जब बिना किसी राजनीतिक व वैचारिक मतभेद के स्वतंत्र रूप से मुक्त व्यापार हुआ करता था। आज के समय में नीतियां केवल अर्थव्यवस्था चलाने का जरिया नहीं, बल्कि कूटनीतिक और भू-रणनीतिक वर्चस्व का एक बड़ा हथियार बन चुकी हैं। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव यशवीर सिंह ने उद्योग जगत को आगाह करते हुए कहा है कि दुनिया अब 'व्यापारिक राष्ट्रवाद' के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में भारतीय उद्योग जगत को केवल 'चीन प्लस वन' के भरोसे रहने के बजाय खुद को एक स्वतंत्र, विश्वसनीय और संप्रभु वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा विभिन्न देशों के साथ हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) एक खूबसूरत दरवाजे की तरह हैं, लेकिन इन दरवाजों को खुद उद्योग जगत को खोलकर आगे बढ़ना होगा।
वैश्विक बाजार में क्यों बढ़ रहा है 'व्यापारिक राष्ट्रवाद' का खतरा?
अतिरिक्त सचिव यशवीर सिंह ने दिल्ली में आयोजित एक विनिर्माण शिखर सम्मेलन में स्पष्ट किया कि आज महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की आपूर्ति को कूटनीतिक हथियार बनाया जा रहा है और प्रौद्योगिकी के स्तर पर जानबूझकर रुकावटें (चोक पॉइंट्स) पैदा की जा रही हैं। वर्तमान में रेयर अर्थ्स, ग्रेफाइट और मैग्नीशियम जैसे स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए आवश्यक खनिजों के प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग पर चीन का एकतरफा दबदबा है। यह एकल-देशीय निर्भरता दुनिया के लिए सबसे बड़ा आर्थिक सुरक्षा जोखिम बन चुकी है। इसके जवाब में अमेरिका का 'चिप्स एक्ट', 'इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट' और यूरोपीय संघ का 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (सीबीएएम) जैसी नीतियां सामने आई हैं। यह बदलाव घर्षण-रहित मुक्त व्यापार के अंत और 'व्यापारिक राष्ट्रवाद' के उदय का स्पष्ट संकेत है।
वाणिज्य मंत्रालय ने उद्योगों को कौन से पांच बड़े मंत्र दिए हैं?
इस नए और जटिल वैश्विक माहौल में भारतीय विनिर्माण और निर्यात को मजबूत करने के लिए वाणिज्य मंत्रालय ने उद्योगों के सामने पांच अनिवार्य रणनीतिक दायित्व रखे हैं:
- एफटीए का अधिकतम उपयोग: कंपनियां व्यापार समझौतों के नियमों और 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' (उत्पत्ति के नियमों) को बारीकी से समझें। शुल्क छूट का लाभ उठाने के लिए अपनी आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) की मैपिंग करें।
- मूल्य शृंखला में ऊपर चढ़ना: भारत को केवल दूसरे देशों के पुर्जे जोड़ने (असेंबली हब) तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि उच्च मूल्य वाले विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
- सप्लाई चेन को मजबूत करना: चीन पर निर्भरता कम करने के लिए महत्वपूर्ण खनिजों, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के विनिर्माण में निवेश बढ़ाना होगा।
- बाजारों का विविधीकरण: पारंपरिक बाजारों से आगे बढ़कर ओमान, न्यूजीलैंड और मॉरीशस जैसे देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों का लाभ उठाएं और खाड़ी देशों, ओशिनिया व पूर्वी अफ्रीका के नए बाजारों में दस्तक दें।
- मानकों का निर्धारण: भारत को वैश्विक मानकों का केवल पालन करने वाला देश बनने के बजाय खुद मानक तय करने वाला देश बनना होगा। यूपीआई, ओएनडीसी और भारतनेट इसके शुरुआती सफल उदाहरण हैं।
निर्यात बास्केट में भारतीय पूंजीगत वस्तुओं की क्या स्थिति है?
उद्योग जगत में हो रहे सकारात्मक बदलावों को रेखांकित करते हुए सिंह ने बताया कि भारत के कुल निर्यात बास्केट में पूंजीगत वस्तुओं (कैपिटल गुड्स) की हिस्सेदारी साल 2014 के 13 प्रतिशत से बढ़कर आज 19 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इस विकास यात्रा को और अधिक गति देने की जरूरत है ताकि देश को वैश्विक स्तर पर एक मजबूत विनिर्माण शक्ति बनाया जा सके।
वैश्विक कंपनियों के लिए भारत क्यों बन सकता है सबसे भरोसेमंद संप्रभु विकल्प?
वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, वैश्विक कंपनियां आपूर्ति शृंखला के लिए भारत पर भरोसा कर सकती हैं क्योंकि भारत 'सप्लाई चेन संप्रभुता' और पारदर्शी नेटवर्क प्रदान करता है। इसके पीछे भारत की मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं, कानूनी रूप से लागू होने वाले अनुबंध, विश्व-स्तरीय डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा, युवा व कुशल कार्यबल, बढ़ता हुआ हरित विनिर्माण और दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजारों में से एक तक पहुंच जैसे मजबूत स्तंभ मौजूद हैं।
आगे की राह क्या है?
भारतीय उद्योग जगत के लिए यह वैश्विक उथल-पुथल एक बड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन साथ ही यह अपनी विनिर्माण क्षमता और विश्वसनीयता को दुनिया के सामने साबित करने का एक बेहतरीन अवसर भी है। यदि भारतीय कंपनियां सरकारी व्यापार समझौतों का सही ढंग से उपयोग करती हैं और अंतरराष्ट्रीय मानकों को तय करने में अग्रणी भूमिका निभाती हैं, तो भारत 'चीन प्लस वन' के तमगे से ऊपर उठकर वैश्विक विकास का अगला सबसे बड़ा और संप्रभु इंजन बनने में सफल होगा।