एमके रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 20 वर्षों में 19 प्रमुख राज्यों की रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चला है कि औसतन, चुनाव के तुरंत बाद वाले वर्ष में मुफ्त रेवड़ी के कारण राज्यों का राजस्व व्यय जीएसडीपी के 0.3 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इन राज्यों में चुनावी वर्ष में वित्तीय घाटा जीडीपी के अनुपात में औसतन 1 प्रतिशत अंक बढ़ गया और उसके अगले वर्ष स्थिर रहा।
पिछले 20 वर्षों के आंकड़ों से पता चला है कि चुनाव के बाद मुफ्त रेवड़ी के कारण राज्यों का खर्च बढ़ता है। एमके रिसर्च की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ साल राज्य चुनावों से भरे रहे हैं। इस दौरान 10 प्रमुख राज्यों में चुनाव हुए। इनमें से लगभग हर राज्य ने, खासकर महिलाओं के लिए, पार्टी लाइन की परवाह किए बिना, नई मुफ्त योजनाएं शुरू कीं। ऐसी योजनाएं चुनाव जीतने की एक मजबूत रणनीति साबित हुई हैं और सभी राज्यों में एक आम बात बन गई हैं।
पिछले 20 वर्षों में 19 प्रमुख राज्यों की रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चला है कि औसतन, चुनाव के तुरंत बाद वाले वर्ष में किसी राज्य का राजस्व व्यय जीएसडीपी के 0.3 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। राज्यों में पूंजीगत व्यय सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 0.2 प्रतिशत तक बढ़ गया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह अधिकतर कैच-अप की वजह से है, क्योंकि आम तौर पर चुनावों से पहले इसका स्तर गिर जाता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस अवधि में राजकोषीय घाटा में कोई बदलाव नहीं होता। राजस्व व्यय विशेष रूप से मुफ्त रेवड़ी के रूप में खर्च, स्थायी प्रवृत्ति का प्रदर्शन करता है। एक बार कोई कल्याण या मुफ्त योजना शुरू हो जाने के बाद उसे घटाना मुश्किल हो जाता है, जबकि नई सरकारों द्वारा नई योजनाओं के परिचय से खर्च में और इजाफा हो जाता है।
राज्यों का वित्तीय घाटा बढ़ा
हाल की दो साल की चुनावी प्रक्रिया पर नजर डालते हुए एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो वर्षों में 10 प्रमुख राज्यों में चुनाव हुए, जिनमें पांच FY24 और पांच FY25 में शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार, इन राज्यों में चुनावी वर्ष में वित्तीय घाटा जीडीपी के अनुपात में औसतन 1 प्रतिशत अंक बढ़ गया और उसके अगले वर्ष स्थिर रहा।
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राजस्व व्यय जीडीपी के अनुपात में चुनावी वर्ष में 0.3 प्रतिशत अंक बढ़ा और चुनाव के अगले वर्ष इसमें और 0.6 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई। इससे मुफ्त और कल्याण योजनाओं के खर्च की स्थायी प्रवृत्ति स्पष्ट होती है।
पूंजीगत व्यय जीडीपी के अनुपात में चुनावी वर्ष में स्थिर रहा, लेकिन अगले वर्ष 0.4 प्रतिशत अंक बढ़ गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्यों ने चुनावी वर्षों में पूंजीगत खर्च को सीमित करके राजस्व व्यय को प्राथमिकता दी, जिसके बाद अगले वर्ष कैच-अप देखा गया।