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आईडीबीआई डील: 'कांग्रेस बैंकों को निजी संपत्ति जैसा इस्तेमाल करती थी', राहुल के आरोपों पर वित्त मंत्री का जवाब

Fri, 30 Oct 2026 02:23 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • आईडीबीआई बैंक में 60.72% हिस्सेदारी की बिक्री को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है।
  • जानिए ₹53,000 करोड़ की इस ऐतिहासिक डील, राजनीतिक आरोपों और बैंकिंग सेक्टर पर इसके असर की पूरी रिपोर्ट। विस्तार से जानने के लिए पढ़ें।
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निर्मला सीतारमण - फोटो : amarujala.com
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विस्तार
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भारतीय बैंकिंग जगत में अब तक के सबसे बड़े विदेशी निवेश और निजीकरण के फैसले पर राजनीति बहस जारी है। आईडीबीआई बैंक में सरकार और एलआईसी की 60.72 प्रतिशत रणनीतिक हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स को बेचने की मंजूरी के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आमने-सामने हैं। एक तरफ राहुल गांधी ने इसे मुनाफा कमाने वाले सार्वजनिक बैंक को बेचने और राष्ट्रीय संपत्तियों के नुकसान का मुद्दा बनाया है, वहीं वित्त मंत्री ने पलटवार करते हुए कांग्रेस शासन के दौरान हुई 'फोनबुक बैंकिंग' और राजनीतिक दबाव में दिए गए डूबे कर्ज (एनपीए) को इस बैंक की पुरानी बदहाली का कारण करार दिया। आईडीबीआई बैंक में विनिवेश की डील करीब 53,000 करोड़ रुपये (5.5 अरब डॉलर) में हुई है, जो भारत के बैंकिंग सुधारों की भावी दिशा तय करने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

आईडीबीआई बैंक के विनिवेश पर सियासी घमासान क्यों?

आईडीबीआई बैंक की रणनीतिक हिस्सेदारी बिक्री को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बैंक कर्मचारियों के साथ एकजुटता जताई है। राहुल गांधी ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बेचे जाने वाली संपत्ति नहीं हैं, बल्कि ये देश के निर्माण का मुख्य जरिया हैं। उन्होंने पिछले साल मार्च में संसद भवन में बैंक कर्मचारियों से हुई मुलाकात का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब बैंक को कर्मचारियों ने अपनी मेहनत से मुनाफे में ला दिया है, तो सरकार इसे कनाडाई कंपनी फेयरफैक्स को क्यों बेच रही है। राहुल गांधी ने लोकसभा में भी इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से पूछा था कि बैंक कर्मचारियों और जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा कैसे की जाएगी, लेकिन सरकार ने बिक्री की कोई ठोस वजह नहीं बताई।

सीतारमण ने कांग्रेस के आरोपों का क्या जवाब दिया?

कांग्रेस के हमलों पर तीखा पलटवार करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि यूपीए शासन के दौरान बैंकों और वित्तीय संस्थानों को 'व्यक्तिगत संपत्ति' की तरह इस्तेमाल किया गया था। सीतारमण ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेताओं के नजदीकी बड़े कारोबारी समूहों, जैसे वीडियोकॉन, विनसम, एबीजी शिपयार्ड और किंगफिशर को राजनीतिक दबाव में मनमाने तरीके से कर्ज देने के लिए बैंक कर्मचारियों पर दबाव बनाया गया, जिससे ये लोन बाद में बड़े एनपीए में बदल गए। वित्त मंत्री ने 1976 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि एसबीआई के तत्कालीन चेयरमैन आरके तलवार को संजय गांधी से जुड़ी कंपनी को ढील न देने पर पद से हटा दिया गया था। उन्होंने कटाक्ष किया कि कांग्रेस के दौर में 'फोनबुक बैंकिंग' चलती थी, लेकिन अब केवल नियमों के तहत पारदर्शी बैंकिंग होती है। सीतारमण ने राफेल मामले का जिक्र करते हुए कहा कि जैसे राहुल गांधी के पिछले झूठ बेनकाब हुए थे और उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी, वैसा ही इस मामले में भी होगा।

सरकार ने आईडीबीआई बैंक को उबारने के लिए क्या कदम उठाए?

वित्त मंत्री के अनुसार, एनडीए सरकार को जब आईडीबीआई बैंक सौंपा गया था, तब वह बेहद जर्जर आर्थिक हालत में था। मोदी सरकार ने पेशेवर प्रबंधन, सख्त नियमों और 25,000 करोड़ रुपये से अधिक के पुनर्पूंजीकरण के माध्यम से इस बैंक को दोबारा उबारा और पटरी पर लाया। उन्होंने साफ किया कि बैंक के पुनर्गठन और विनिवेश की पूरी प्रक्रिया में सभी तय नियमों व प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन किया गया है। इस सरकारी मदद और कुशल प्रबंधन के चलते ही बैंक आज अपने विकास के अगले चरण में प्रवेश करने के लिए तैयार हुआ है।

आईडीबीआई बैंक की इस डील के आंकड़े क्या कह रहे?

गत 14 अक्तूबर को सरकार ने आईडीबीआई बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को लगभग 53,000 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी है। यह सौदा भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) है। इस सौदे का ढांचा इस प्रकार तय किया गया है:

  • केंद्र सरकार की हिस्सेदारी: सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी लगभग 26,620 करोड़ रुपये में बेचेगी।
  • एलआईसी की हिस्सेदारी: एलआईसी अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी लगभग 26,440 करोड़ रुपये में बेचेगी।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से आवश्यक नियामक मंजूरी मिलने के बाद चालू वित्त वर्ष के अंत तक यह रणनीतिक बिक्री पूरी होने की उम्मीद है। बैंकिंग विश्लेषकों का मानना है कि इस डील की सफलता से न केवल सार्वजनिक बैंकों के रणनीतिक विनिवेश अभियान को गति मिलेगी, बल्कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में विदेशी पूंजी और वैश्विक पेशेवर विशेषज्ञता का प्रवेश भी आसान होगा।

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आईडीबीआई बैंक का विनिवेश भारत के बैंकिंग क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत का संकेत देता है। जहां एक तरफ सरकार इसे पेशेवर बैंकिंग और आर्थिक सुधार की बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे सार्वजनिक संपत्तियों की बिक्री के तौर पर घेर रहा है। अब सभी की निगाहें रिजर्व बैंक की अंतिम मंजूरी और चालू वित्त वर्ष के अंत तक इस सौदे के अंतिम समापन पर टिकी हैं।

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