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फूड प्रोसेसिंग कंपनियों को खेत तक लाने की सरकार ने की तैयारी: हरसिमरत कौर बादल

Mon, 06 Nov 2017 02:47 PM IST
amarujala.com- Presented By: अनंत पालीवाल
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Harsimrat Kaur Badal
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फूड प्रोसेसिंग यानी खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय कोई नया मंत्रालय नहीं है, पहले यह यह कृषि मंत्रालय का हिस्सा हुआ करता था। लेकिन खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की महत्ता और इसमें किए जाने वाले काम के आकार को देखते हुए सरकार ने इसे एक अलग मंत्रालय बना दिया।
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इस मंत्रालय के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य है प्रधानमंत्री की किसानों की आय को दोगुना करने की चाहत को पूरा करना। राह की चुनौतियां हैं प्रोसेसिंग के अभाव में उपज की बर्बादी को रोकना, किसानों के दरवाजे पर उद्योग को लाना और फूड पार्क, कोल्ड चेन के जरिए रोजगार के साथ कृषि तंत्र को विकसित करना।

इन सभी मुद्दों पर उमेश्वर कुमार की केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल से विशेष बातचीत हुई। पेश हैं इसके मुख्य अंश :

प्रश्न - अपने फोकस के तहत यह मंत्रालय क्या-क्या कर रहा है?
- मैं समझती हूं यह एक ऐसा मंत्रालय है, जो आज हमारे देश की मुख्य समस्याओं का समाधान निकालने में एक केंद्रीय भूमिका निभा सकता है। यह किसानी संकट को दूर करने, व्यापार को बढ़ाने, युवाओं को रोजगार देने में और आखिर में भारी मात्रा में खाद्य पदार्थों की बर्बादी को बचा सकता है। आज हम दुनिया में दूध के उत्पादन में एक नंबर पर हैं। दो नंबर पर हम फल, सब्जियां, मछली आदि के उत्पादन में हैं।
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इसका अर्थ है कि किसान अपना पेट भरने के लिए मेहनत कर रहा है। लेकिन रख-रखाव का साधन कम होने, यानी, सिर्फ 10 फीसदी प्रोसेसिंग होने के कारण उत्पादों की खराबी ज्यादा होती है। मौसम का असर रहता है। व्यापारियों के पास उतना साधन नहीं हैं कि वे अपना व्यापार ज्यादा बढ़ा सकें। इन सभी चीजों को देखते हुए हम एक ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहे हैं, ऐसी नीतियां बना रहे हैं जिससे खाद्य प्रसंस्करण का दायरा और स्तर बढ़े। जिससे व्यापारियों को फायदा हो, रोजगार को फायदा हो और किसान का फायदा हो।

प्रश्न - ग्राउंड लेबल पर खाद्य प्रसंस्करण के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं?
पहली चीज, इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। इसकी प्रकृति सीजनल है जिससे किसी भी संयंत्र पर खर्च तो पूरा होता है, लेकिन यह चलता सिर्फ सीजन में है। पहले हमने इस क्षेत्र में ऋण देने के लिए 2,000 करोड़ रुपये का कोष नाबार्ड में तैयार किया। मंत्रालय की योजनाओं के अनुरूप हमने मेगा फूड पार्क, कोल्ड चेन जैसी योजनाओं को लागू किया।

एक नई स्कीम प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना जिसमें फार्म के साथ बैकवर्ड-फारवर्ड लिंकेज के लिए, फार्म में रख-रखाव के लिए, मेगा फूड पार्क में यूनिट लगाई जाएगी, ताकि इसका अधिक से अधिक उपयोग हो। कोल्ड चेन के साथ मिनी फूड पार्क के लिए हमने देश की मैपिंग कराई कि कहां कौन से खाद्यान्न हैं और कहां किस तरह के प्रोसेसिंग की जरूरत है।

इसको हमने ग्राउंड लेबल पर किया और फिर 100 फीसदी एफडीआई की नीति लेकर आए ताकि विदेशी पैसे से देश के किसानों का भला हो। इससे खूब निवेश आया। बीते साल की तुलना में एफडीआई में 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

प्रश्न - एक छोटा और मझोला किसान फूड प्रोसेसिंग के साथ कैसे जुड़े? उसके पास न तो तकनीकी ज्ञान है और न ही जेब में पैसे हैं, साथ ही इतनी सामर्थ्य भी नहीं है कि किसी बड़े सरकारी अधिकारी के सामने जाकर खड़े होकर उनसे बात कर सके।
- आज यही मजबूर किसान इतना मजबूर होता है कि कभी-कभी उसे अपनी उपज को खेत में छोड़ना पड़ता है या फिर उसे सड़क पर फेंकने पड़ते हैं। कई बार सिर्फ वह लागत मूल्य पर ही उसे बेच पाता है।

आज तैयारी इस बात की हो रही है कि ऐसे उद्योग पैदा हों जिन्हें चलाने के लिए उद्योग किसान के दरवाजे तक आए। कच्चा माल उसकी मजबूरी हो जिससे कि वह किसानों के पास खुद आए और किसान के साथ ताल-मेल करे। किसान को बीज दे, उपकरण दे, तकनीक दे ताकि किसान वह चीज उगा सके। फिर उसे चाहे जहां अधिक दाम मिले वह वहां बेचे। मंडी में या फिर उद्योग के पास।

साथ ही मंत्रालय के ऐसे गोदाम उसकी पहुंच में हों जहां वह उसे रख सके और जब कुछ माह उसे लगे कि दाम ठीक मिलेगा तब उसे बेचे। इस तरह के सफल प्रयोग पंजाब में किए जा चुके हैं।

प्रश्न - देश की भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग हिस्से में कुछ खास परियोजनाएं चल रही हैं क्या?
- पहाड़ी और पूर्वोत्तर भारत में हमारा खास ऑर्गेनिक का फोकस है। दूसरे किसानों के लिए हमने 45 मेगा फूड पार्क हर राज्य में लगा के, देश भर में कोल्डचेन ग्रिड बना के, डेलॉय और पीडब्ल्यूसी को जिम्मेदारी दी है कि देश भर में वे किसानों की विशिष्ट जरूरतों के हिसाब से बताएं कि शुरू से आखिर तक किस तरह से किसानों को मदद दी जानी है। हम किसानों को एग्रो प्रोसेसर बना रहे हैं।
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प्रश्न - अंतरमंत्रालयी समन्वय की दिशा में कुछ हो रहा है क्या?
- हमारे प्रधानमंत्री ने पहले ही हमें कह दिया था कि हमें एकाकी रूप में काम नहीं करना है। एक दूसरे के साथ समन्वय में काम करना है। इसलिए हमने एफएसएसआई जो पहले हेल्थ में आता था, उस दिक्कत को खत्म किया।

उगाने का काम कृषि में आता है, रख-रखाव उपभोक्ता में आता है, प्रोसेसिंग का काम मेरे पास आता है। नियामकीय काम स्वास्थ्य में आता है। मैं तो चाहती हूं कि एक ऐसी बॉडी हो जो यह देखे कि उपभोक्ता की मांग क्या है और उसी हिसाब से कृषि मंत्रालय उस चीज को उगाने पर जोर दे।

उपभोक्ता मंत्रालय उसके रख-रखाव पर जोर दे और प्रोसेसिंग मंत्रालय उसकी प्रोसेसिंग करे। इससे संबंधित सुझाव मैंने प्रधानमंत्री के पास भेजा भी है। मैं चाहती हूं कि एक फूड प्रोसेसिंग नीति बने। जिसमें यह स्पष्ट हो कि देश के किसी भी भाग में प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए क्या करना होगा। सभी राज्यों में सिंगल विंडो सिस्टम हो। कृषि की दर पर बिजली मिले।

प्रश्न- अगर किसी किसान को छोटी-सी डेयरी खोलनी है तो वह क्या करे?
उत्तर- हमारा मंत्रालय एक अलग फंड बनाने की कोशिश कर रहा है जिससे सबको लोन मिले चाहे वह डेयरी हो, मछली हो या कुछ और हो। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना में अप्लाई करिए। इसमें आप ऑनलाइन जाइए। कागज भरिए। घर के पढ़े-लिखे बच्चे से भरवाइए।

डेलॉय और पीडब्ल्यूसी इसे देख रहे हैं। देश को उत्तर और दक्षिण में विभक्त किया गया है। यह कंपनी आपके पास आदमी भेजेगी। वह आपका पूरा मॉडल बनाएगा, डीपीआर बनाके, इंडस्ट्री लगाके, दो साल तक साथ रह कर यानी हैंड होल्डिंग कर के जाएगा। यह मॉडल छोटे किसानों के लिए भी होगा। इसमें कोऑपरेटिव, सेल्फ हेल्फ महिला समूह को विशेष तरजीह दी जा रही है।
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