इंदौर का 37 वर्षीय महिपाल नौकरी की तलाश में जब बड़े शहर की ओर बढ़ा तो उसे गुरुग्राम में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी मिली। अकाउंटिंग में स्नातक महिपाल अपने गृहनगर में जितना सोचा था, अब उससे कहीं अधिक कमा रहा था। उसकी नौकरी के शुरुआती वर्ष बहुत रोमांचक थे। वह इस कदम से खुश था। वह कुछ दोस्तों के साथ रहा और भावनात्मक व वित्तीय साझेदारी ने उनके रोजाना के जीवन को दिलचस्प बना दिया। वह अपने वेतन का आधे से अधिक हिस्सा बचाने और इसे अपनी छोटी बहन की कॉलेज की शिक्षा के लिए घर भेजने और किसान पिता का समर्थन करने में सक्षम था। जब तक उसके घर में किसी की शादी नहीं होनी थी, तब तक सब ठीक था।
अचानक बदलाव से होता है वित्तीय असर
अचानक उसके जीवन में बड़ा बदलाव आया। उसे किराया साझा करने के लिए एक नए दोस्त की तलाश थी। या फिर अपने दोस्त के साथ ज्यादा किराया देकर रहने की। या फिर अपने दोस्त को उसकी नवविवाहिता पत्नी के साथ रहने दे और खुद घर से बाहर निकल जाए। इस स्थिति से उसे जीवन में बदलते हालात और इसका वित्तीय प्रभाव समझ में आया। महिपाल का परिवार उसके पैसे पर निर्भर होता जा रहा था। जैसे-जैसे वह उम्र के 30 वर्ष के करीब पहुंच रहा था, उसे लगा कि उसके अधिकांश साथी शादीशुदा हो गए हैं या शादी करने वाले हैं। वह अपने विवाह से पहले 23 वर्षीय बहन की शादी का इंतजार कर रहा था। अब जब वह दोस्तों का साथ छोड़कर अकेले रहने निकला तो उसे वित्तीय बोझ का अहसास होना शुरू हुआ। हालांकि, उसे दो नए दोस्त मिल गए। उसे पहली बार अपनी बहन की शादी के लिए कर्ज लेने का सामना करना पड़ा। 2017 में उसने जो 5 लाख उधार लिया था, उसे लेकर वह अब भी परेशान था। यह एक पर्सनल लोन था जो बहुत ज्यादा ब्याज पर लिया गया था। साथ ही, उसे अपने माता-पिता के स्वास्थ्य के इलाज के लिए भी पैसे देने होते थे।
शादी के बाद बदला जीवन, बढ़ गए कर्ज
उसे नोएडा में एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। लगा कि उसके सपने धीरे-धीरे सच हो रहे हैं। उसने अपने लिए एक साथी को भी तलाश लिया जिससे कुछ महीने बाद वह शादी करने वाला था। 30 साल की उम्र में शादी कर ली। पत्नी के साथ सुखमय जीवन शुरू करने के लिए फिर से उधार लिया। नई मोटरसाइकल, बड़ा टीवी और फ्लैट के लिए फर्नीचर की खरीद की। हालांकि, ये ऐसे खर्च थे, जिनके लिए कुछ समय तक इंतजार किया जा सकता था। हिमाचल में हनीमून पर हुए खर्च ने भी महिपाल को प्रभावित किया। ये सब कुछ किस्त पर था और उसको लग रहा था कि सारे कर्ज का भुगतान आराम से हो जाएगा।
हर माह 20-25 तारीख तक उधार की नौबत
महिपाल को 4-5 वर्षों के बाद ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा, जब उसके वेतन का 30 फीसदी हिस्सा कर्ज चुकाने में जा रहा था। शादी के दो साल के भीतर एक बच्चे का जन्म हुआ। इसे संभालने के लिए फिर से उधार लेना पड़ा। इस बीच, महिपाल के पिता गुजर गए। अब मां भी साथ रहने लगी। एक बेडरूम वाला घर अब तीन लोगों और एक बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं रहा। 2022 में महिपाल की ऐसी हालत हो गई कि हर महीने की 20-25 तारीख को उसके पास एक रुपये भी नहीं होते थे। हालांकि, इस वित्तीय संकट से निपटने के लिए महिपाल हर दिन अंशकालिक और रविवार को पूर्णकालिक कैब चलाने लगा।
जाल से बाहर निकलना मुश्किल
महिपाल के जीवन से यह पता चलता है कि कर्ज की बुरी आदत जीवन को कठिन बनाने के लिए अच्छा उदाहरण है। कर्ज और आसान पैसा एक ऐसी लत है जिससे बाहर निकलना मुश्किल है। केवल तभी उधार लें, जब आपको जरूरत हो और उतना ही लें, जितना आप आसानी से बिना किसी दिक्कत चुका सकें।
- कर्ज संस्कृति के बीच यह भी चिंता जरूरी है कि क्या किसी को भी ऐसी स्थितियों का सामना करना चाहिए।
- यह एक ऐसा जाल है, जिसमें उलझने के बाद निकल पाना बहुत कठिन है। ऐसी स्थितियों में आपको बेहतर जीवन जीने के लिए सोच समझकर ही कर्ज लेने की नीति अपनानी चाहिए।