एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने अपने ऐतिहासिक आईपीओ से 75 अरब डॉलर जुटाए हैं और कंपनी का वैल्यूएशन 2.1 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गया है। इस शानदार शुरुआत के साथ ही मस्क 1.1 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति के साथ दुनिया के पहले 'ट्रिलियनेयर' बन चुके हैं। इस तूफानी संपत्ति सृजन को देखकर हर निवेशक मस्क की कंपनियों (टेस्ला, स्पेसएक्स, xAI, स्टारलिंक) का हिस्सा बनना चाहता है। अच्छी खबर यह है कि वैश्वीकरण और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के दौर में कोई भी भारतीय नागरिक कानूनी रूप से अमेरिकी शेयर बाजार में निवेश कर सकता है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि एक भारतीय निवेशक रिजर्व बैंक और टैक्स नियमों के दायरे में रहकर किस तरह अमेरिकी बाजारों में एंट्री ले सकता है?
हां, बिल्कुल। भारतीय निवेशक इंडमनी, वेस्टेड, या एचडीएफस सिक्योरिटीज जैसे डिजिटल निवेश प्लेटफार्मों या अमेरिकी ब्रोकरेज फर्मों के जरिए अमेरिकी एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध शेयरों की सीधे खरीद कर सकते हैं। अमेरिकी बाजार की सबसे बड़ी खासियत 'आंशिक शेयर' की सुविधा है। इसका मतलब है कि अगर स्पेसएक्स का शेयर 160 डॉलर (करीब 15,232 रुपये) का है, तो आपको पूरा शेयर खरीदने की जरूरत नहीं है; आप मात्र 10 डॉलर (लगभग 950 रुपये) लगाकर भी उसका एक छोटा अनुपातिक हिस्सा खरीद सकते हैं। इसके अलावा, आपके निवेश को अमेरिका के एसआईपीसी की ओर से 5,00,000 डॉलर तक का बीमा कवर भी मिलता है।
कोई भी भारतीय मनमाने ढंग से पैसा विदेश नहीं भेज सकता। इसके लिए रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (एफईएमए) के तहत 'उदारीकृत प्रेषण योजना' (एलआरएस) लागू की है। इस योजना के तहत कोई भी निवासी भारतीय (नाबालिग सहित) एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 2,50,000 अमेरिकी डॉलर बिना किसी पूर्व अनुमति के विदेश भेज सकता है। यह सीमा प्रति पैन कार्ड लागू होती है, यानी चार सदस्यों वाला परिवार मिलकर साल में 1 मिलियन डॉलर तक का निवेश कर सकता है।
जब आप अपने भारतीय बैंक खाते से अमेरिकी ब्रोकरेज खाते में रुपये भेजते हैं, तो उसे 'आउटवर्ड रेमिटेंस' कहा जाता है। इस प्रक्रिया में 'फॉर्म A2' भरना एक अनिवार्य कानूनी आवश्यकता है, जिसमें यह घोषणा करनी होती है कि धन वैध स्रोतों से है और किसी प्रतिबंधित काम में इस्तेमाल नहीं होगा। सबसे महत्वपूर्ण है आरबीआई का पर्पस कोड यानी उद्देश्य कोड। विदेशी शेयर खरीदने के लिए आपको फॉर्म में 'S0001' (विदेशी इक्विटी में निवेश) कोड का ही चुनाव करना होगा। इसी तरह, जब आप मुनाफा कमाकर डॉलर को वापस रुपये में भारत लाते हैं, तो बैंक को 'P0001' कोड बताना होता है।
विदेशी निवेश की अग्रिम लागत को समझना जरूरी है:
अमेरिकी ब्रोकरेज खाता खोलने के बाद आपको अमेरिका के आंतरिक राजस्व सेवा (आईआरएस) का 'W-8BEN फॉर्म' भरना जरूरी होता है। यह प्रमाणित करता है कि आप अमेरिकी नहीं बल्कि भारतीय करदाता हैं। इस फॉर्म को भरने से आप शेयर बेचने पर होने वाले पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन्स) पर 30% के फ्लैट अमेरिकी टैक्स से पूरी तरह बच जाते हैं। साथ ही, भारत-अमेरिका कर संधि (डीटीएए) के तहत किसी भी लाभांश (डिविडेंड) पर विदहोल्डिंग टैक्स 30% से घटकर 25% हो जाता है।
भारत में विदेशी निवेश पर नियम काफी सख्त हैं:
विदेशी निवेश कानूनी है, लेकिन इसे छिपाना अत्यंत विनाशकारी हो सकता है। भारत सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत, हर निवेशक को अपने वार्षिक आयकर रिटर्न (आईटीआर) में 'अनुसूची एफए'के अंतर्गत विदेशी संपत्तियों के बारे में बताना अनिवार्य है, भले ही उसके पास 100 रुपये का एक ही शेयर क्यों न हो। यदि कोई निवेशक भूलवश भी इसे दर्ज करना भूल जाता है, तो 'काला धन अधिनियम, 2015' की धारा 43 के तहत उस पर सीधे 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाता है। मुंबई आईटीएटी (आईटीएटी) के एक फैसले के अनुसार, अनजाने में हुई भूल का तर्क भी आपको 10 लाख के जुर्माने से नहीं बचा सकता।
इस तरह, एलन मस्क की कंपनियों के जरिए तकनीकी क्रांति और धन सृजन का हिस्सा बनना अब भारतीय निवेशकों की पहुंच में हैं। हालांकि इस तरह का कोई भी कदम निवेशकों को अपने विवेक का पूरा इस्तेमाल करने के बाद ही लेना चाहिए। आंशिक शेयरों के साथ छोटी शुरुआत की जा सकती है, बशर्ते निवेशक रिजर्व बैंक के एलआरएस नियमों, टीसीएस प्रावधानों और सबसे बढ़कर, इनकम टैक्स रिटर्न में 'अनुसूची एफए' के तहत कड़े अनुपालन का पूरी तरह से पालन करे।