भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) जनवरी में खाद्य मुद्रास्फीति में गिरावट आने पर फरवरी में दरों में कटौती पर विचार कर सकती है। आईसीआईसीआई बैंक की एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि खाद्य कीमतों में गिरावट आर्थिक विकास को समर्थन देने के लिए नीतिगत दरों में ढील देने का रास्ता साफ कर सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया, "जनवरी में खाद्य कीमतों में अपेक्षित गिरावट फरवरी में दरों में कटौती की संभावना को बढ़ा सकती है"। एमपीसी की नवीनतम बैठक के मिनटों में एक नरम रुख का पता चला, जिसमें दो सदस्यों ने दरों में कटौती की वकालत की। उनका तर्क विकास में नरमी और वर्तमान में खाद्य मुद्रास्फीति के मुख्य मुद्रास्फीति में सीमित असर डालने पर आधारित था।
हालांकि, दरों को बनाए रखने के लिए मतदान करने वाले अन्य सदस्यों ने तर्क दिया कि दरों में कटौती के लिए समय उचित नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले महीनों में कम खाद्य मुद्रास्फीति इस तरह के कदम के लिए उपयुक्त अवसर प्रदान कर सकती है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, नवंबर में खुदरा मुद्रास्फीति 5.48 प्रतिशत थी, जबकि अक्टूबर में यह 6.21 प्रतिशत थी, जो भारतीय रिजर्व बैंक के 2-6 प्रतिशत के आराम बैंड के अनुरूप है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि मुद्रास्फीति में गिरावट आगे भी जारी रहती है तो फरवरी में आगामी एमपीसी में दर में कटौती की संभावना अधिक है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि समानांतर रूप से, फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (एफओएमसी) के हॉकिश रुख से प्रेरित यूएस डॉलर इंडेक्स (डीएक्सवाई) के मजबूत होने के कारण भारतीय रुपया (आईएनआर) मूल्यह्रास दबाव में रहा है।
इस मूल्यह्रास दबाव के कारण 0.2 बिलियन अमरीकी डॉलर के शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) का बहिर्वाह हुआ। इसमें कहा गया है, "बिगड़ते बाह्य परिदृश्य को देखते हुए, हम उम्मीद करते हैं कि रुपये पर मूल्यह्रास का दबाव आगे भी जारी रहेगा।" रिपोर्ट में घरेलू मुद्रास्फीति के रुझान और बाह्य कारकों के बीच अंतर्सम्बन्ध पर प्रकाश डाला गया है, जो आने वाले महीनों में आरबीआई के मौद्रिक नीति निर्णयों को आकार देगा।