उत्पादकता और असमानता के मोर्चे पर भारत के लिए सबक
भविष्य के इस सुनहरे अनुमान के बीच भारत के नीति-निर्माताओं के लिए कुछ चिंताएं भी हैं। रिपोर्ट स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है कि भारत में चीन की तुलना में कहीं अधिक आर्थिक असमानता है। इसके साथ ही भारत की उत्पादकता वृद्धि दर भी चीन से काफी कम है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, चीन की इस बेहतर उत्पादकता के पीछे मानव पूंजी पर उसका अधिक और बेहतर तरीके से लक्षित खर्च मुख्य कारण रहा है, जो भारत के लिए एक बड़ा नीतिगत सबक है। बता दें कि पीपीपी का अर्थ यह मापना है कि किसी देश की मुद्रा की एक इकाई से दूसरे देश में कितनी वस्तुएं और सेवाएं खरीदी जा सकती हैं, और इसी मानक पर ये सभी लंबी अवधि के आर्थिक अनुमान लगाए गए हैं।
मौजूदा परिदृश्य में कहां खड़ी है दुनिया?
भविष्य की इन संभावनाओं के बीच 2026 की वर्तमान स्थिति को समझना भी आवश्यक है। नवीनतम वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (डब्ल्यूईओ) के अनुसार, साल 2026 में भारत की कुल जीडीपी 4.15 ट्रिलियन डॉलर के स्तर पर होगी। इसकी तुलना में यूके की जीडीपी 4.27 ट्रिलियन डॉलर और जापान की 4.38 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान है। वहीं, 32.38 ट्रिलियन डॉलर के विशाल आकार के साथ अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा, जबकि चीन 20.85 ट्रिलियन डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर काबिज रहेगा। भारत का लक्ष्य इसी अंतर को पाटते हुए अगले कुछ दशकों में शीर्ष पर अपनी जगह बनाना है।