व्यापार लागत में कमी, घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने और निर्यात को फिर से रफ्तार देने के लिए भारत को अपने आयात शुल्क ढांचे और आयात शुल्क संरचना में बड़े पैमाने पर सुधार करने होंगे। यह निष्कर्ष व्यापार नीति पर काम करने वाले थिंक-टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की ताजा रिपोर्ट में सामने आया है।
'भारत के आयात शुल्क और सीमा शुल्क व्यवस्था के आधुनिकीकरण के लिए एक खाका' वाली शीर्षक रिपोर्ट में टैरिफ नीति, कस्टम्स प्रक्रियाओं, निर्यात प्रोत्साहन और मानव संसाधन तैनाती से जुड़े सुधारों की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इन उपायों को लागू करने से कस्टम्स एक नियंत्रण-आधारित व्यवस्था से निकलकर विकास को सक्षम बनाने वाली संस्था में बदल सकता है, जो भारत की विनिर्माण और सप्लाई-चेन रणनीति के अनुरूप होगी।
यह अध्ययन ऐसे समय में आया है, जब भारत का मर्चेंडाइज व्यापार 1.16 ट्रिलियन डॉलर को पार कर चुका है और देश के जीडीपी का करीब 29 प्रतिशत हिस्सा कस्टम्स क्लियरेंस के दायरे में आता है। जीटीआरआई ने चेताया कि मौजूदा स्थिति में छोटी-सी भी अक्षमता पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालती है, इनपुट लागत बढ़ती है, शिपमेंट में देरी होती है और निर्यात प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ती है, खासकर तब जब वैश्विक कंपनियां भू-राजनीतिक बदलावों के बीच नई सप्लाई लोकेशन तलाश रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से दिसंबर में कस्टम्स प्रक्रियाओं में सुधार के संकेत मिलने से नीति स्तर पर एक अहम अवसर बना है, लेकिन टुकड़ों में किए गए बदलाव पर्याप्त नहीं होंगे।
GTRI ने सिफारिश की है कि:
थिंक-टैंक ने सरकार से आग्रह किया है कि सभी नोटिफिकेशन को स्व-निहित बनाया जाए और सभी आयात शुल्क को एक एकीकृत ऑनलाइन शेड्यूल में प्रकाशित किया जाए, ताकि पारदर्शिता बढ़े और अनुपालन आसान हो।