एके पांडे
ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं, लेकिन ये एक महत्वपूर्ण बात को उजागर करते हैं कि उपभोक्ता इस बात से अनजान थे कि वे जिन ऐप्स का उपयोग कर रहे थे वे अवैध थे, और उनका डेटा अवैध गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था।
व्हाइटलिस्ट फ्रेमवर्क
गेमिंग सेक्टर में इस समस्या से निपटने का एक व्यावहारिक तरीका 'व्हाइटलिस्ट' फ्रेमवर्क बनाना हो सकता है। सरल शब्दों में, 'व्हाइटलिस्ट' एक सिस्टम है जो वैध और अवैध व्यवसायों या ऐप्स के बीच अंतर करता है। यह तंत्र फिनटेक, गेमिंग, क्रिप्टो, ओटीटी या सोशल मीडिया जैसे सभी डिजिटल अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों के लिए समान रूप से प्रभावी हो सकता है।
वैध ऐप्स को अवैध ऐप्स से अलग करना एक नियामक पहेली की तरह लग सकता है, लेकिन इसे चार आसान सवालों के माध्यम से सरल बनाया जा सकता है। उचित जांच और संतुलन बनाए रखने के लिए, सरकार को यह जानना होगा...
ऑफलाइन व्हाइटलिस्ट फ्रेमवर्क
साइबरस्पेस और उसमें होने वाले अपराध गुमनामी पर आधारित होते हैं, जहां बेनाम, पहचानहीन तत्व सक्रिय रहते हैं। 'विश्वास का प्रतीक' बनाकर, उपभोक्ता वैध व्यवसायों को पहचान सकते हैं जो कानूनी और उच्च क्वालिटी वाली सेवाएं और उत्पाद प्रदान करते हैं, और उन्हें अवैध व अस्थायी ऑपरेटरों से अलग कर सकते हैं। इसका एक ऑफलाइन उदाहरण 'ISI' मार्क है, जो 1950 से उत्पादों के लिए गुणवत्ता और अनुपालन का एक मानक चिह्न बन गया है।
एक तरफ, इसने उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण उत्पादों की पहचान करने और उन्हें खरीदने में मदद की, और दूसरी तरफ, इसने निर्माताओं के लिए एक मानक स्थापित किया जो बाजार में व्यापार करना चाहते थे। डिजिटल इकोसिस्टम को ऐसे ही 'विश्वास के प्रतीक' की जरूरत है, जो ग्राहकों को यह आश्वासन दे सके कि उत्पाद कानूनी, प्रामाणिक और भारत के डिजिटल कानूनों के अनुरूप है।
इस विश्वास-निर्माण के प्रयास की जिम्मेदारी केवल व्यवसायों के कंधों पर नहीं होनी चाहिए। सभी व्यवसाय इसे जरूरी नहीं मान सकते, और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्राहक उन 'विश्वास के प्रतीकों' पर भरोसा नहीं कर सकते जो निजी व्यवसायों द्वारा बनाए गए हों। इसलिए, तेजी से बदलते डिजिटल दौर से आगे रहने के लिए उद्योग, सरकार और समाज के बीच एक समन्वित और सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है।