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Digital Era: व्हाइटलिस्ट फ्रेमवर्क बनाएगा डिजिटल इकोसिस्टम को भरोसेमंद, ग्राहकों की सुरक्षा होगी सुनिश्चित

Wed, 08 Jan 2025 05:23 PM IST
Anil Vaishya नई दिल्ली

सार

Digital Ecosystem: 2017 और 2023 के बीच खुदरा डिजिटल भुगतानों में 50.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आज हमारा डिजिटल इकोसिस्टम दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार माना जा रहा है। 2014 में इसने भारत की जीडीपी में 4.5 प्रतिशत योगदान दिया और 2026 तक इसके जीडीपी में 20 प्रतिशत योगदान देने की उम्मीद है। देश के डिजिटल इकोसिस्टम के बारे में और विस्तार से जानें।
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डिजिटल इकोसिस्टम - फोटो : Digital Ecosystem
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विस्तार
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एके पांडे

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भारत की इंटरनेट अर्थव्यवस्था पिछले दशक के दौरान तेजी से आगे बढ़ी है। डिजिटल लोकतंत्रीकरण ने डिजिटल सेवाओं के लिए एक विशाल बाजार तैयार किया है। 90 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन इंटरनेट कनेक्शन के साथ, भारतीय डिजिटल इकोसिस्टम ने सॉफ़्टवेयर और कुशल श्रम के निर्यातक से दुनिया के सबसे बड़े रियल-टाइम भुगतान बाजार के रूप में खुद को परिवर्तित किया है।

भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था
2017 और 2023 के बीच खुदरा डिजिटल भुगतानों में 50.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आज हमारा डिजिटल इकोसिस्टम दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता हुआ बाजार माना जा रहा है। 2014 में इसने भारत की जीडीपी में 4.5 प्रतिशत योगदान दिया और 2026 तक इसके जीडीपी में 20 प्रतिशत योगदान देने की उम्मीद है।
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आम भारतीय के लिए जीवन निश्चित रूप से बदल गया है। इंटरनेट अर्थव्यवस्था ने अभूतपूर्व पहुंच और सुविधा प्रदान की है। ई-कॉमर्स, स्वास्थ्य, बीमा और निवेश जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर डिजिटल परिवर्तन हुआ है, जिससे नए उद्यमियों के लिए लाखों अवसर पैदा हुए हैं। शायद इसीलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कई यूनिकॉर्न हमारे रोजमर्रा के जीवन में अनिवार्य साझेदार बन गए हैं।

इस बड़े बदलाव में कई योगदानकर्ता हैं, जिनमें से एक गेमिंग सेक्टर है। 45 करोड़ से अधिक गेमर्स ( PWC के अनुसार जिनमें से 0.18 करोड़ ई-स्पोर्ट्स खिलाड़ी हैं) के साथ भारतीय ऑनलाइन गेमिंग बाजार के 2023-2028 के बीच 14.5% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) के साथ 66,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

उपभोक्ता कमजोरियों का शोषण
हालांकि, इस तेज़ी से हो रही वृद्धि के साथ कई साइबर संबंधी समस्याएं भी सामने आई हैं। आज हम कई ऐसे मामलों में वृद्धि देख रहे हैं जहां ग्राहक धोखाधड़ी करने वाले तत्वों के जाल में फंस गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें आर्थिक नुकसान हुआ है। अगर मैं हाल के कुछ उदाहरणों पर प्रकाश डालूं तो

अगस्त 2024 में भारतीय जांच एजेंसियों ने एक फिनटेक घोटाले का भंडाफोड़ किया, जिसमें भारतीय और चीनी नागरिकों, इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप्स, कंपनियों और क्रिप्टो एक्सचेंजों के जटिल नेटवर्क के माध्यम से धन की हेराफेरी की जा रही थी।

  • कई मामलों में एजेंसियों ने चीनी लोन ऐप्स पर शिकंजा कसा, जो अनजान उपभोक्ताओं को शोषणकारी उधारी प्रथाओं में फंसाते थे।
  • अहमदाबाद स्थित एक अन्य फिनटेक कंपनी पर आरोप लगा कि उसने अवैध सट्टेबाजी के जरिये सैकड़ों करोड़ रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग के लिए 150 बैंक खातों का उपयोग किया।

ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं, लेकिन ये एक महत्वपूर्ण बात को उजागर करते हैं कि उपभोक्ता इस बात से अनजान थे कि वे जिन ऐप्स का उपयोग कर रहे थे वे अवैध थे, और उनका डेटा अवैध गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था।

व्हाइटलिस्ट फ्रेमवर्क
गेमिंग सेक्टर में इस समस्या से निपटने का एक व्यावहारिक तरीका 'व्हाइटलिस्ट' फ्रेमवर्क बनाना हो सकता है। सरल शब्दों में, 'व्हाइटलिस्ट' एक सिस्टम है जो वैध और अवैध व्यवसायों या ऐप्स के बीच अंतर करता है। यह तंत्र फिनटेक, गेमिंग, क्रिप्टो, ओटीटी या सोशल मीडिया जैसे सभी डिजिटल अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों के लिए समान रूप से प्रभावी हो सकता है।

वैध ऐप्स को अवैध ऐप्स से अलग करना एक नियामक पहेली की तरह लग सकता है, लेकिन इसे चार आसान सवालों के माध्यम से सरल बनाया जा सकता है। उचित जांच और संतुलन बनाए रखने के लिए, सरकार को यह जानना होगा...

  1. क्या कंपनी भारत में पंजीकृत है और उसके कार्यालय भारत में स्थित हैं?
  2. क्या कंपनी भारत में GST का भुगतान करने के लिए पंजीकृत है?
  3. क्या कंपनी खुद घोषणा करती है कि वह अपने क्षेत्र से संबंधित कर, शिकायत निवारण, विज्ञापन और उत्पाद/सेवा की गुणवत्ता पर लागू कानूनों का पालन करती है?
  4. जो व्यवसाय उपरोक्त मानदंडों का पालन करते हैं, उन्हें सद्भावना से काम करने वाला माना जा सकता है और उन्हें 'विश्वास का प्रतीक' दिया जा सकता है, जो सही और गलत को अलग करने में मदद करेगा।

ऑफलाइन व्हाइटलिस्ट फ्रेमवर्क
साइबरस्पेस और उसमें होने वाले अपराध गुमनामी पर आधारित होते हैं, जहां बेनाम, पहचानहीन तत्व सक्रिय रहते हैं। 'विश्वास का प्रतीक' बनाकर, उपभोक्ता वैध व्यवसायों को पहचान सकते हैं जो कानूनी और उच्च क्वालिटी वाली सेवाएं और उत्पाद प्रदान करते हैं, और उन्हें अवैध व अस्थायी ऑपरेटरों से अलग कर सकते हैं। इसका एक ऑफलाइन उदाहरण 'ISI' मार्क है, जो 1950 से उत्पादों के लिए गुणवत्ता और अनुपालन का एक मानक चिह्न बन गया है।

एक तरफ, इसने उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण उत्पादों की पहचान करने और उन्हें खरीदने में मदद की, और दूसरी तरफ, इसने निर्माताओं के लिए एक मानक स्थापित किया जो बाजार में व्यापार करना चाहते थे। डिजिटल इकोसिस्टम को ऐसे ही 'विश्वास के प्रतीक' की जरूरत है, जो ग्राहकों को यह आश्वासन दे सके कि उत्पाद कानूनी, प्रामाणिक और भारत के डिजिटल कानूनों के अनुरूप है।

इस विश्वास-निर्माण के प्रयास की जिम्मेदारी केवल व्यवसायों के कंधों पर नहीं होनी चाहिए। सभी व्यवसाय इसे जरूरी नहीं मान सकते, और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्राहक उन 'विश्वास के प्रतीकों' पर भरोसा नहीं कर सकते जो निजी व्यवसायों द्वारा बनाए गए हों। इसलिए, तेजी से बदलते डिजिटल दौर से आगे रहने के लिए उद्योग, सरकार और समाज के बीच एक समन्वित और सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है।

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अंतिम लक्ष्य सभी के लिए एक ही है। ऐसे सुरक्षा उपाय तैयार करना, जिससे उपभोक्ता और उद्योग अस्थायी और अवैध ऑपरेटरों से सुरक्षित रह सकें। यह अब हमारे राष्ट्रीय लक्ष्य, एक ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण मिशन बन गया है।

(लेखक ट्राई के पूर्व संयुक्त सलाहकार रहे हैं)

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