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गिरावट : डॉलर का दुनिया में और घटा रुतबा, यूरो-येन और युवान को फायदा

Sun, 09 May 2021 06:31 PM IST
योगेश साहू डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, टोक्यो।

सार

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा मुख्य रूप से चीन और रूस के अपने विदेशी मुद्रा भंडारों में अलग-अलग देशों की मुद्राओं को अधिक जगह देने की वजह से हुआ है। साथ ही डॉलर की दीर्घकालिक संभावना को लेकर गहरा रही चिंता भी इसका एक कारण है।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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2020 लगातार पांचवां साल रहा, जब दुनिया भर के देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा घटा। बीते साल उसका हिस्सा 59 फीसदी रह गया। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा मुख्य रूप से चीन और रूस के अपने विदेशी मुद्रा भंडारों में अलग-अलग देशों की मुद्राओं को अधिक जगह देने की वजह से हुआ है। साथ ही डॉलर की दीर्घकालिक संभावना को लेकर गहरा रही चिंता भी इसका एक कारण है। 

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गौरतलब है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से तमाम देशों की सरकारें अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश को अपनी आर्थिक स्थिरता से जोड़ कर देखती रही हैं। मौद्रिक आपातकाल के लिए तमाम देश अपने भंडार में डॉलर की एक निश्चित मात्रा रखते आए हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के ताजा आंकड़ों से संकेत मिलता है कि रिजर्व करेंसी के रूप में डॉलर का आकर्षण घट रहा है। कोरोना महामारी के समय अमेरिका पर कर्ज का अनुपात और राजकोषीय घाटा बढ़ने से डॉलर की दीर्घकालिक संभावना को लेकर संदेह बढ़ा है। इसलिए अब सरकारें वैकल्पिक मुद्राओं और सोना जैसे गैर-करेंसी विकल्पों में ज्यादा निवेश कर रही हैं।

आईएमएफ ने 2020 में 149 देशों के विदेशी मुद्रा भंडार की सूची जारी की है। इसके मुताबिक इन देशों का साझा मुद्रा भंडार 12.7 ट्रिलियन डॉलर का था। पिछले साल सकल रूप में डॉलर की मात्रा में चार प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह सात ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। जापान के मिजुहो बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री दाइसुके काराकामा के मुताबिक, इसकी वजह यह थी कि उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों ने अपनी देसी मुद्रा का ज्यादा निवेश डॉलर में किया, ताकि उनके लिए आयात करना आसान बना रहे। काराकामा के मुताबिक, इसकी एक और वजह यह रही कि पिछले साल अमेरिका ने अधिक संख्या में बॉन्ड जारी किए, ताकि वह कोरोना प्रोत्साहन पैकेज के लिए ज्यादा रकम जुटा सके।
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लेकिन जहां तक विदेशी मुद्रा भंडारों में डॉलर के अनुपात का सवाल है, तो उसमें 1.7 प्रतिशत की गिरावट आई। 1995 के बाद ऐसा पहली बार हुआ, जब विदेशी मुद्रा भंडारों में डॉलर का हिस्सा गिरकर 60 प्रतिशत से नीचे आ गया। गौरतलब है कि 2001 के बाद से ज्यादातर समय विदेशी मुद्रा भंडारों में डॉलर का हिस्सा 70 प्रतिशत से ऊपर रहा। आईएमएफ के दो अर्थशास्त्रियों सेरकान अर्सलनाल्प और चीमा सिम्पसन-बेल ने एक ब्लॉग में लिखा है कि लंबी अवधि को ध्यान में रखें, तो विदेशी मुद्रा भंडारों में डॉलर का हिस्सा गिरा है। यह इस बात का संकेत है कि अलग-अलग देशों के केंद्रीय बैंक सचमुच धीरे-धीरे डॉलर के विकल्पों की तरफ जा रहे हैं।

अमेरिकी वित्त मंत्रालय के मुताबिक 2020 में चीन का अमेरिका सरकार की प्रतिभूतियों में 1.07 ट्रिलियन का निवेश था। सात साल पहले की तुलना में यह 20 प्रतिशत कम है। निक्को सिक्योरिटीज के वरिष्ठ अर्थशास्त्री कोटा हिरायामा ने एक वेबसाइट से कहा कि चीन के ट्रेजली होल्डिंग्स का ज्यादातर हिस्सा विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में है। रूस के विदेशी मुद्रा भंडार में भी डॉलर का हिस्सा घटा है। अब उसका विदेशी मुद्रा भंडार 578.7 अरब डॉलर मूल्य का है, जिसमें डॉलर का हिस्सा सिर्फ 20 फीसदी है। 2017 तक ये हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत होता था।

डॉलर का हिस्सा घटने का लाभ यूरो, येन (जापानी मुद्रा) और युवान (चीनी मुद्रा) को मिला है। 2020 में विदेशी मुद्रा भंडारों में यूरो का हिस्सा 21 प्रतिशत हो गया। यह छह साल पहले के यूरो के हिस्से के बराबर है। तब यूरो का हिस्सा सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा था। येन का हिस्सा अब 6 प्रतिशत हो गया है। दो दशक में पहली बार उसका हिस्सा यहां तक पहुंचा है। चीन के निवेशकों ने पिछले साल 2.2 ट्रिलियन डॉलर मूल्य के येन को खरीदा। युवान का हिस्सा 2 प्रतिशत हो गया है। यह उसका सर्वोच्च स्तर है। इसके अलावा सोने में भी देशों ने निवेश बढ़ाया है।

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