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Israel-Iran Conflict: इस्राइल-ईरान तनाव से होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट, भारत को क्यों करनी चाहिए चिंता, जानें

Sat, 14 Jun 2025 08:07 PM IST
रिया दुबे बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

इस्राइल-ईरान के संघर्ष का असर भारत पर भी पड़ सकता है। इसकी मुख्य वजह है होर्मुज जलडमरूमध्य जो ईरान में स्थित है। दो-तिहाई से अधिक तेल और लगभग आधे तरलीकृत प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से भारत में आयात किए जाते हैं। ऐसे में अगर होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित होता है तो भारत को दूसरे स्रोतों और जलमार्गों की तलाश करनी पड़ सकती है।
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इस्राइल-ईरान तनाव - फोटो : PTI
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विस्तार
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इस्राइल ने शुक्रवार तड़के ईरान की राजधानी तेहरान पर हमला किया। इस्राइली  सेना ने ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। जवाबी कार्रवाई करते हुए शनिवार को ईरान ने भी इस्राइल पर हमला शुरू कर दिया। ईरान-इस्राइल के बीच बढ़ते तनाव की स्थिति पश्चिम एशिया के अलावा भारत जैसे देशों पर भी असर डाल सकती है। वैश्विक चिंता का मुख्य कारण होर्मुज जलडमरूमध्य है। 

होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है खास?

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है क्योंकि यह फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है। दुनिया के तेल परिवहन का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। यह ईरान और ओमान के बीच स्थित है। अगर यहां तनाव और बढ़ता है तो तेल की आपूर्ति पर असर पड़ेगा और कीमतें बढ़ जाएंगी।  इससे भारत सहित दुनिया भर में ईरान और इस इलाके से आने वाले ईंधन पर निर्भर रहने वाली कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं। 

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तेल को हथियार बनाया जा सकता है- जूलियस बेयर

वेल्थ मैनेजमेंट फर्म जूलियस बेयर के अर्थशास्त्री नॉबर्ट रकर ने कहा कि भू-राजनीति वापस आ गई है। ईरान पर इस्राइल के हमले से क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में तेल को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और कीमतें बढ़ सकती हैं। स्थिति अब भी अस्थिर हैं। आने वाले दिनों और हफ्तों में पता चलेगा की तनाव कितना बढ़ा है। 

भारत कैसे है होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर?

इसका विशेष रूप से भारत पर असर पड़ रहा है। भारत के दो-तिहाई से अधिक तेल आयात और लगभग आधे तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर ही गुजरते हैं। अगर इस मार्ग में कोई भी बाधा उत्पन्न होती है, तो भारत को दूसरे स्रोतों और मार्गों की तलाश करनी पड़ सकती है। आयात में ज्यादा खर्च होने के साथ देश को लॉजिस्टिकल चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है। ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए भारत को रणनीतिक उपाय की जरूरत है। 

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होर्मुज जलडमरूमध्य - फोटो : Amar Ujala

तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचने की संभावना  

अमेरिकी वित्तीय सेवा कंपनी जेपी मॉर्गन ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान और इस्राइल का संघर्ष बढ़ता है तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती है। इससे महंगाई बढ़ने के साथ-साथ भारत का चालू खाता घाटा बढ़ेगा। शुक्रवार को वैश्विक तेल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 7.44 प्रतिशत बढ़कर 74.52 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। एक अन्य जानकार- जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के शोध प्रमुख विनोद नायर ने कहा कि ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें 76 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं, जो इस साल का उच्चतम स्तर है।  

शिपिंग फर्म को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ेगा

कच्चे तेल की अधिक कीमतों के कारण शिपिंग फर्म की परिचालन लागत बढ़ जाएगी। जहाजों के मार्ग बदलने से आयात-निर्यात के दौरान अधिक लंबा सफर तैय करना होगा, इससे माल ढोने का शुल्क और डिलिवरी का समय भी बढ़ेगा। भू- राजनीतिक तनाव से संघर्ष-ग्रस्त जलक्षेत्रों में चलने वाले जहाजों के बीमा प्रीमियम में भी वृद्धि होगी। इससे वैश्विक व्यापार लागत पर दबाव बढ़ेगा।   

भारतीय परिवारों और उद्योगों पर पड़ेगा असर 

तेल की कीमतों में उछाल से आम आदमी और व्यवसायों पर भी बड़ा असर पड़ेगा। उपभोक्ता का बजट प्रभावित होगा और खर्च में कमी आएगी। इसके अलावा, कच्चे माल के रूप में तेल पर निर्भर उद्योगों को उत्पादन लागत में वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है। इससे उन्हें प्रतिस्पर्धा करने में परिशानियों का सामना करना पड़ेगा। अक्सर देखा गया है कि भू-राजनीतिक तनाव का असर केवल उन दो देशों पर ही नहीं पड़ता बल्कि इससे कहीं न कहीं पूरी दुनिया प्रभावित होती है।
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