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कोरोना से पूरी दुनिया डूब गई है अभूतपूर्व कर्ज के जाल में, जल्द उबरना होगा मुश्किल

Sat, 12 Dec 2020 05:58 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन

सार

आईआईएफ की गणना के मुताबिक 2020 दुनिया पर 277 खरब डॉलर के कर्ज का बोझ छोड़ कर जाएगा। ये रकम सारी दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से 365 फीसदी ज्यादा है...
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जीडीपी में भारी गिरावट (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : iStock
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विस्तार
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कोरोना महामारी के दौर में दुनियाभर की सरकारें कर्ज में डूबती जा रही हैं। दुनियाभर में कर्ज के ट्रेंड पर नजर रखने वाली संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस (आईआईएफ) के मुताबिक वैक्सीन आने से दुनिया भले कोरोना महामारी से उबर जाए, लेकिन इसकी वजह से जो आर्थिक संकट पैदा हुआ है, उससे जल्द उबरना आसान नहीं होगा।

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अर्थव्यवस्थाओं पर कोरोना महामारी की दोहरी मार पड़ी। एक तरफ लॉकडाउन के कारण सारा कारोबार ठप हो जाने से सरकारों के राजस्व में अभूतपूर्व गिरावट आ गई। दूसरी तरफ सरकारों को अपनी जनता और कारोबार को संभालने के लिए महंगे राहत पैकेजों का एलान करना पड़ा। इसके लिए उन्होंने धन कर्ज लेकर जुटाया। इससे लगभग सभी देशों में राजकोषीय संकट खड़ा हो गया है।


आईआईएफ की गणना के मुताबिक 2020 दुनिया पर 277 खरब डॉलर के कर्ज का बोझ छोड़ कर जाएगा। ये रकम सारी दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से 365 फीसदी ज्यादा है। इस संस्था के मुताबिक जीडीपी के तुलना में कर्ज का अनुपात सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में इस साल तेजी से बढ़ा है।
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आईआईएफ के आंकड़े विजुअलकैपिटलिस्ट.कॉम नाम की वेबसाइट ने प्रकाशित किए हैं। इसके मुताबिक जीडीपी के अनुपात में कर्ज का सबसे ज्यादा बोझ विकसित देशों पर चढ़ा है। लेकिन आईआईएफ का कहना है कि अगर बारीकी से गौर करें, तो कर्ज का ये स्तर लगभग सभी देशों पर एक जैसा नजर आता है।

कर्ज की स्थिति को समझने के लिए अर्थशास्त्री आम तौर पर जीडीपी की तुलना में कर्ज की मात्रा पर गौर करते हैं। इसका मतलब यह होता है कि किसी देश में एक साल में जितना धन पैदा होता है, उसकी तुलना में कर्ज का प्रतिशत क्या है। इसे जानने के लिए किसी देश पर मौजूद कर्ज में उसके वार्षिक जीडीपी से भाग दिया जाता है। अगर अनुपात ज्यादा आता है, तो उसे चिंताजनक स्थिति माना जाता है।

विश्व बैंक के विश्लेषण के मुताबिक जीडीपी के 77 फीसदी से ज्यादा कर्ज का होना चिंताजनक बात मानी जाती है। वर्ल्ड बैंक का कहना है कि उसके ऊपर बढ़े हर एक फीसदी कर्ज का परिणाम सालाना विकास में 0.017 फीसदी की गिरावट के रूप में सामने आता है।

आईआईएफ के मुताबिक 2019 की तीसरी तिमाही के बाद विकसित देशों में जीडीपी की तुलना में सरकारी कर्ज के अनुपात में 21 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा इन देशों में घरेलू कर्ज में छह फीसदी इजाफा हुआ है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक विकसित देशों की सरकारों ने खरबों अरब का राहत पैकेज दिया, इसलिए सरकारी कर्ज तेजी से बढ़ा, जबकि घरेलू कर्ज में अपेक्षाकृत कम वृद्धि हुई। विकसित देशों में इस साल सबसे ज्यादा कर्ज कनाडा में बढ़ा है। वहां जीडीपी की तुलना में कर्ज का अनुपात 80 फीसदी तक पहुंच गया है। पहले से ही ऊंचे कर्ज से पीड़ित अमेरिका में ये आंकड़ा 102 फीसदी तक पहुंच गया है।

उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में कर्ज का सबसे ज्यादा बोढ़ गैर-वित्तीय कंपनियों पर बढ़ा है। 11 फीसदी बढ़ोतरी के साथ जीडीपी की तुलना में इस कर्ज का अनुपात वहां 104 फीसदी हो गया है।

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक 2008 में आर्थिक मंदी आने के बाद भी जीडीपी की तुलना में कर्ज का अनुपात बढ़ा था। तब विकसित देशों की सरकारों ने नोटों की ज्यादा छपाई करके स्थिति को संभाला था। लेकिन इस बार संकट कहीं ज्यादा गहरा है। नोटों की ज्यादा छपाई से मुद्रा की कीमत गिरने का अंदेशा है, जिससे नई समस्याएं खड़ी होंगी।

ऐसे में कर्ज के बोझ से सरकारें कैसे निकलेंगी, इसका कोई साफ रास्ता फिलहाल नजर नहीं आता। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक समस्या इसलिए ज्यादा गहरी है, क्योंकि अर्थव्यवस्था में तेजी से उछाल की अभी कोई संभावना नजर नहीं आती। ऐसे में सरकारों के राजस्व में सुधार की गुंजाइश कम ही है।

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