तेल कीमतों में आई गिरावट (फाइल फोटो)
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विदेशी बाजारों में सुस्ती के रुख के बीच बीते हफ्ते दिल्ली के तेल-तिलहन बाजार में अधिकांश तेल-तिलहनों की कीमतों में हानि दर्ज हुई। बाजार सूत्रों ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहले से ही भारी तेलों के लिवाल नहीं हैं, जबकि कोरोना वायरस, कोविड-19 के फैलने की वजह से भी मांग प्रभावित हुई है।
उन्होंने कहा कि विदेशों के भारी तेलों के मुकाबले हल्के खाद्य तेलों की स्थानीय मांग बढ़ी है जिससे पामोलीन, सोयाबीन जैसे तेलों के भाव प्रभावित हुए हैं जबकि वायदा कारोबार में सट्टेबाज सरसों की कीमत एमएसपी से भी कम लगा रहे हैं। दूसरी ओर आयात शुल्क मूल्य बाजार भाव के अनुरूप नहीं होने से विदेशों से पामोलीन, सोयाबीन जैसे तेल के आयातकों के लिए आयात लाभप्रद नहीं रह गया है।
उन्होंने कहा कि इस कारोबार में बैंकों का भी काफी पैसा लगा है जिसके फंसने की आशंका पैदा हो सकती है। भारत में सोयाबीन, पामोलीन और कच्चे पाम तेल (सीपीओ) का आयात शुल्क मूल्य, बाजार भाव के मुकाबले 300-400 रुपये प्रति क्विंटल ऊंचा रखा गया है।
मंडियों में सरसों की नई फसल की आवक शुरू हो गई है और मार्च के पहले सप्ताह के दौरान बरसात और तेज हवा के कारण सरसों के साथ कई अन्य फसलों को नुकसान हुआ है। लेकिन वायदा कारोबार में सरसों के एमएसपी से भी कम बोली लगाए जाने के कारण इनकी कीमतों में गिरावट देखने को मिली।
समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान सरसों (तिलहन) और सरसों दादरी तेल का भाव क्रमश: 150 रुपये और 220 रुपये की हानि के साथ क्रमश: 4,050-4,080 रुपये और 8,300 रुपये पर बंद हुआ। जबकि सरसों पक्की घानी और सरसों कच्ची घानी टिन के भाव भी पिछले सप्ताहांत के बंद स्तर के मुकाबले 30-30 रुपये की गिरावट के साथ क्रमश: 1,335-1,495 रुपये और 1,370-1,515 रुपये प्रति टिन पर बंद हुए।