रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने शहरी सहकारी बैंकों द्वारा किसी एक इकाई या समूह को दिए जाने वाले कर्ज की अधिकतम सीमा क्रमश: 10 फीसदी और 25 फीसदी करने का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य किसी एक समूह को भारी कर्ज दिए जाने से हुए पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक जैसे घोटालों पर रोक लगाना है। वर्तमान नियमों के तहत शहरी सहकारी बैंक एक कंपनी या कर्जदारों के समूह को अपने कुल पूंजी कोष का क्रमश: 15 फीसदी और 40 फीसदी तक कर्ज दे सकते हैं।
हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर लि. (एचडीआईएल) समूह की कंपनियों को 6,226.01 करोड़ रुपये का कर्ज देने से पीएमसी बैंक बंदी के कगार पर पहुंच गया है। इस महीने की शुरुआत में आरबीआई केंद्रीय बोर्ड ने शहरी सहकारी बैंकों के कामकाज और उनके प्रवर्तन संबंधी ढांचे की समीक्षा की थी।
अपने मसौदे में आरबीआई ने कहा कि किसी एक ग्राहक/पक्षों या एक-दूसरे से जुड़े कर्जदारों/पक्षों के समूह को भारी कर्ज देने से पूंजी के प्रति जोखिम बढ़ता है। जब ऐसे बड़े कर्ज फंस जाते हैं या एनपीए बन जाते हैं तो इससे संबंधित बैंक की पूंजी/नेटवर्थ प्रभावित होती है। इससे तरलता घटती है और दिवालिया होने का जोखिम पैदा होता है।
आरबीआई ने मसौदे में कहा, ‘सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए किसी एक इकाई/समूह के लिए शहरी सहकारी बैंकों के कर्ज की सीमा की समीक्षा की गई। जोखिम घटाने के लिए इसे व्यवस्थित करने का फैसला किया गया।’ इस मसौदे पर सभी हित धारकों से 20 जनवरी तक टिप्पणियां मांगी गई हैं।